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हांसदा सोवेंद्र शेखर की किताब ‘सीमेन, सलाइवा, स्वीट, ब्लड’ पर लगेगा प्रतिबंध, खरीदनेवाला भी जायेगा जेल

Updated at : 11 Aug 2017 2:58 PM (IST)
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हांसदा सोवेंद्र शेखर की किताब ‘सीमेन, सलाइवा, स्वीट, ब्लड’ पर लगेगा प्रतिबंध, खरीदनेवाला भी जायेगा जेल

रांची : आदिवासी लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का विरोध रंग लाया. आखिरकार साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखक-साहित्यकार हांसदा सोवेंद्र शेखर की अश्लील पुस्तक को झारखंड सरकार ने बैन करने का एलान कर दिया. झारखंड सरकार के मंत्री सरयू राय ने मुख्यमंत्री की मौजूदगी में शुक्रवार को विधानसभा में यह एलान किया. मॉनसून सत्र के तीसरे […]

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रांची : आदिवासी लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का विरोध रंग लाया. आखिरकार साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखक-साहित्यकार हांसदा सोवेंद्र शेखर की अश्लील पुस्तक को झारखंड सरकार ने बैन करने का एलान कर दिया. झारखंड सरकार के मंत्री सरयू राय ने मुख्यमंत्री की मौजूदगी में शुक्रवार को विधानसभा में यह एलान किया.

मॉनसून सत्र के तीसरे दिन नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन ने सोवेंद्र शेखर की अश्लील पुस्तक ‘सीमेन, सलाइवा, स्वेट, ब्लड’ का मुद्दा उठाया. इस पर सरयू राय ने कहा कि पाकुड़ के डीसी को आदेश दे दिया गया है. सरकार इस पुस्तक को प्रतिबंधित करेगी. इतना ही नहीं, जिसके पास यह किताब मिलेगी, उस पर भी कार्रवाई होगी.

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यहां बताना प्रासंगिक होगा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता झारखंड के डॉक्टर और लेखक-साहित्यकार हांसदा सोवेंद्र शेखर की इस पुस्तक के खिलाफ आदिवासी समुदाय के बुद्धिजीवियों ने जबरदस्त गुस्से का इजहार किया था. साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ताअों ने उनके उपन्यास ‘सीमेन, सलाइवा, स्वीट, ब्लड’ की अश्लील भाषा पर आपत्ति जतायी. बुद्धिजीवियों ने साहित्य अकादमी को पत्र लिख कर यहांतक पूछ डाला कि ऐसे किसी लेखक को साहित्य अकादमी जैसा प्रतिष्ठित सम्मान कैसे दे दिया गया? अकादमी के पुरस्कार देने के नियम क्या हैं?

डॉ शेखर को वर्ष 2015 में उनके उपन्यास ‘द मिस्टीरियस एलीमेंट ऑफ रूपी बास्के’ के लिए साहित्य अकादमी का युवा लेखक का पुरस्कारमिला था. लेकिन उनके नये उपन्यास की भाषा ने आदिवासी साहित्यकारों, समाजसेवियों को उद्वेलित कर दिया. देश भर के आदिवासी समुदाय के लोगों ने डॉ हांदसा का विरोध करना शुरू कर दिया.

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आदिवासी समाज और आंदोलन पर कई किताबें लिखनेवाले अश्विनी कुमार पंकज तो डॉ हांसदा की भाषा शैली से क्षुब्ध थे. उन्होंने फेसबुक पर अपने गुस्से का इजहार किया. लिखा, ‘जब मैंने इस अंग्रेजी उपन्यास को पढ़ा, तो हैरत हुई कि एक लेखक सिर्फ बाहरी दुनिया, जिससे आदिवासी समाज अनेक वर्षों से सांस्कृतिक युद्ध में है, से प्रशंसा-पुरस्कार पाने के लिए किस हद तक ‘गैरजरूरी’ लेखन कर सकता है. और जब हांसदा सोवेंद्र शेखर की कहानियों का संग्रह ‘द आदिवासी विल नॉट डांस’ आया, तो मेरी यह धारणा और मजबूत हुई कि इस आदिवासी लेखक को अपने ‘आदिवासीपन’ से घृणा है. यह बेहद दुखद पहलू है.’

सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने भी फेसबुक पर ही डॉ हांसदा सोवेंद्र शेखर के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार किया. लिखा, ‘कोकशास्त्र के महान लेखक डॉ हांसदा सोवेंद्र शेखर को साहित्यकार बता कर उनकी कृति के लिए उन्हें पुरस्कार दिया गया, और अब जब उनकी आलोचना हो रही है, तो कुछ लोग उनको अभी भी महान साहित्यकार बता कर उनके पक्ष में खड़े हैं. ऐसे लोगों से सवाल पूछा जाना चाहिए कि डा. हांसदा के उपन्यास और कहानी संग्रह में आदिवासी दर्शन कहां है?’

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इतना तीव्र विरोध के बावजूद हांसदा सोवेंद्र शेखर अपने स्टैंड पर अडिग रहे. कहा कि उन्हें अपनी लेखनी में कुछ गलत नहीं लगता.कहा, ‘मैंने जो लिखा है, वह एकदम सही लिखा है. किसी को आपत्ति हो सकती है. इसमें कुछ भी गलत नहीं लिखा है.’

ज्ञात हो कि रांची में जन्मे और घाटशिला व चकुलिया में पले-बढ़े डॉ हांसदा सोवेंद्र शेखर पेशे से चिकित्सक हैं. पाकुर के सिविल सर्जन कार्यालय में पदस्थापित हैं. 15 साल की उम्र से ही उन्होंने पत्र-पत्रिकाअों में लिखना शुरू कर दिया था. इंडियन लिटरेचर, द स्टेट्समैन, द एशियन एज, गुड हाउसकीपिंग, नॉर्थईस्ट रिव्यू, द फोर क्वार्टर्स मैगजीन, अर्थेन लैंप जर्नल, अलकेमी जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाअों में उनकी लघु कहानियां और लेख प्रकाशित हो चुके हैं.

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