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तीन सौ वर्षों से मां आनंदमयी काली मंदिर आस्था का केंद्र

Updated at : 19 Oct 2025 5:32 PM (IST)
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तीन सौ वर्षों से मां आनंदमयी काली मंदिर आस्था का केंद्र

मां आनंदमयी काली मंदिर, पाकुड़ में तीन सौ वर्षों से मां काली की पूजा-अर्चना का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर धार्मिक और लोकविश्वास दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन नीम का पेड़ मां काली की छाया माना जाता है और इसकी पूजा समान रूप से की जाती है। स्थानीय कथा के अनुसार, पहले अज्ञात व्यक्ति हर साल नीम के पेड़ के पास काली पूजा करते थे, जिसके बाद पेड़ के नीचे फूल और खून के निशान मिलते थे। समय के साथ यह स्थल देवी शक्ति का प्रतीक बन गया और नियमित पूजा-अर्चना शुरू हुई। हर काली पूजा पर हजारों श्रद्धालु यहां जुटते हैं, और मंदिर समिति पूजा व्यवस्था व साफ-सफाई करती है। यह स्थल स्थानीय श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

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नगर प्रतिनिधि, पाकुड़. स्थानीय श्रद्धा और आस्था का केंद्र मां आनंदमयी काली मंदिर तीन सौ वर्षों से मां काली की पूजा-अर्चना का साक्षी बना हुआ है. यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि लोकविश्वास और रहस्यमयी परंपरा से भी जुड़ा हुआ है. मंदिर परिसर में स्थित एक प्राचीन नीम का पेड़ विशेष आकर्षण का केंद्र है. स्थानीय लोगों का मानना है कि यह नीम का पेड़ मां काली की छाया का प्रतीक है और इसकी पूजा भी माता के समान ही की जाती है. मां आनंदमयी काली मंदिर कमेटी के अध्यक्ष नीलकंठ यादव ने बताया कि पूर्वजों से यह कथा चली आ रही है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व इस नीम के पेड़ के पास वर्ष में एक बार अज्ञात व्यक्ति द्वारा पूजा की जाती थी. किसी को यह नहीं पता चल पाता था कि पूजा कौन करता है, परंतु काली पूजा की रात के बाद पेड़ के नीचे फूल और खून के निशान दिखाई देते थे. धीरे-धीरे इस स्थान को देवी शक्ति का प्रतीक माना जाने लगा और लोगों ने यहां नियमित रूप से मां काली की पूजा प्रारंभ की. आज यह स्थल पूरे क्षेत्र में श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन चुका है. हर वर्ष काली पूजा के अवसर पर हजारों श्रद्धालु यहां जुटते हैं. स्थानीय समिति की ओर से मंदिर परिसर की साफ-सफाई, सजावट तथा भक्तों के बैठने और दर्शन की समुचित व्यवस्था की जाती है. इसके अलावा हर अमावस्या को भी विशेष पूजा-अर्चना होती है, जिसमें दूर-दराज से भक्त बड़ी संख्या में पहुंचते हैं. श्रद्धा, आस्था और परंपरा का यह संगम आज भी ग्वालपाड़ा की पहचान बना हुआ है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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SANU KUMAR DUTTA

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By SANU KUMAR DUTTA

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