स्वतंत्रता दिवस विशेष: 1942 में कुड़ू थाना में टाना भगतों ने फहराया था चरखा छाप तिरंगा

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घंटा बजाते टाना भगत| Prabhat Khabar Network

स्वतंत्रता संग्राम में टाना भगतों का गौरवशाली इतिहास और कुड़ू थाना में तिरंगा फहराने की अनसुनी कहानी। जानें कैसे आज भी संघर्ष में जी रहे हैं टाना भगत।

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अमित कुमार राज की रिपोर्ट

कुड़ू/लोहरदगा. एक तरफ जहां पूरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, तो दूसरी तरफ अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिला देने वाले टाना भगत आजादी के 79 साल बाद भी कुड़ू प्रखंड के विभिन्न गांवों में गरीबी में जीवन जीने को विवश हैं. टाना भगतों का आजादी के 79 साल बाद भी ना तो सामाजिक ना ही आर्थिक और ना ही शिक्षा के क्षेत्र में विकास हो पाया है. मूलभूत सुविधाओं के लिए टाना भगत तरस रहे हैं.

कुड़ू में लगभग 5000 हैं टाना भगत

कुड़ू प्रखंड के आधा दर्जन गांवों बंदुवा, दुबांग, चीरी बरवाटोली, जिंगी, टाकू पतरा टोली तथा अन्य गांवों में टाना भगत निवास करते हैं. टाना भगतों की कुल आबादी कुड़ू प्रखंड में लगभग 5000 है. टाना भगत आज भी पुरानी पद्धति व राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बताये अहिंसा परमो धर्म के मार्ग पर चल रहे हैं. कुड़ू प्रखंड के टाना भगतों का इतिहास काफी गौरवशाली रहा है. बताया जाता है कि साल 1914 में कुड़ू के टाना भगत देश छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थें. प्रखंड के बंदुवा गांव निवासी जतरा टाना भगत, आशीर्वाद टाना भगत, पुरण टाना भगत, गुदरी टाना भगत व चंदा टाना भगत आंदोलन में कूद पड़े थे. इस टीम का नेतृत्व जतरा टाना भगत ने किया था. साल 1930 में लोहरदगा में स्वतंत्रता आंदोलनकारियों का अधिवेशन बुलाया गया था, जहां जतरा टाना भगत ने कुड़ू क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था.

सात जिलों तक पहुंच गया था टाना भगतों का आंदोलन

कुड़ू क्षेत्र में वर्तमान के लोहरदगा, गुमला व लातेहार जिला से लेकर चतरा जिला का कुछ हिस्सा शामिल था. इसके बाद आंदोलन ने धार पकड़ीं थी. आंदोलन में शामिल टाना भगत महाजनी प्रथा, अंग्रजों के राजस्व कर अदा करने के खिलाफ व अपनें जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए आंदोलन की राह पकड़े थे. आंदोलन को अहिंसा वादी बनाने तथा महात्मा गांधी को आदर्श मानने वाले टाना भगतों का आंदोलन कुड़ू से निकलकर आसपास के क्षेत्र डालटनगंज, रांची, गुमला तथा चतरा तक पहुंच गया.

एक साल तक जेल में रहे थे पांच टाना भगत

आंदोलन को देख अंग्रेजी हुकूमत ने पांचों टाना भगतों को धोखे से साल 1939 में गिरफ्तार करते हुए बिहार के फुलवारीशरीफ जेल में डाल दिया, जबकि आशीर्वाद टाना भगत व जतरा टाना भगत को सेल में बंद कर दिया. एक साल तक जेल में रहने के बाद सभी बाहर निकले तथा आंदोलन को तेज कर दिया. साल 1941 में रामगढ़ में कांग्रेस का अधिवेशन बुलाया गया, जहां इनकी सुभाषचंद्र बोस से फिर हजारीबाग में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से मुलाकात हुई. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आशीर्वाद टाना भगत तथा जतरा टाना भगत के आंदोलन को देखते हुए रांची क्षेत्र का नेता बनाया. बड़ी जिम्मेदारी मिलने से आशीर्वाद टाना भगत व जतरा टाना भगत का मनोबल काफी बढ़ गया. आजादी के पहले 26 जनवरी 1942 को आशीर्वाद टाना भगत, जतरा टाना भगत, पुरण टाना भगत, लालू टाना भगत, गुदरी टाना भगत व चंदा टाना भगत ने अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती देते हुए कुड़ू थाना में चरखा छाप तिरंगा फहराया.

इंदिरा गांधी ने ताम्रपत्र देकर किया था सम्मानित

तिरंगा फहराने के पहले अंग्रेजी हुकूमत ने सभी छह आंदोलनकारियों को खूब धमकाया, लेकिन अहिंसा के पुजारी व महात्मा गांधी के अनुयायी टाना भगतों के कदम तिरंगा फहराने के लिए नहीं डिगा और घंटा बजाकर चरखा छाप तिरंगा फहराने में कामयाब रहे. इसके बाद से हर 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) व 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) के मौके पर चरखा छाप तिरंगा कुड़ू में फहराया जाता है. इसके बाद देश अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ. साल 1965 में जब इंदिरा गांधी की सरकार बनी तो सभी टाना भगतों को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया गया.

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मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे

देश को आजादी दिलाने में सत्य व अहिंसा के पथ पर चलते हुए आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले टाना भगत आज मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं. प्रखंड के बंदुवा गांव निवासी तथा देश को आजादी की जंग में दक्षिण छोटानागपुर क्षेत्र का नेतृत्व करने वाले स्व आशीर्वाद टाना भगत का गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से मरहूम है. गांव में ना तो पेयजल की समुचित व्यवस्था हैं ना ही गांव तक पहुंचने वाली सड़क की हालत ठीक है. राज्य सरकार को इस दिशा में पहल करने की जरूरत है.


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विकाश नाथ

लेखक के बारे में

By विकाश नाथ

26 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हूं. रिपोर्टिंग के साथ डेस्क का काम करने भी अनुभव प्राप्त है. खेल डेस्क में भी काम करने का अनुभव है. रुरल के संस्करणों को देखता हूं.

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