खटिया पर अस्पताल जाते हैं मरीज

Updated at : 24 Feb 2018 4:36 AM (IST)
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खटिया पर अस्पताल जाते हैं मरीज

विडंबना. आजादी के 70 साल बाद भी आदिम युग में जी रहे मसुरियाखांड़ के ग्रामीण कुड़ू : आजादी के 70 साल बाद भी राज्य के कई जिलों में गांवों की स्थिति काफी खराब है़ लोगों को बुनियादी सुविधा भी नहीं मिल पा रही है़ देश को कैशलेस करने, स्वच्छ करने का काम हो रहा है. […]

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विडंबना. आजादी के 70 साल बाद भी आदिम युग में जी रहे मसुरियाखांड़ के ग्रामीण

कुड़ू : आजादी के 70 साल बाद भी राज्य के कई जिलों में गांवों की स्थिति काफी खराब है़ लोगों को बुनियादी सुविधा भी नहीं मिल पा रही है़ देश को कैशलेस करने, स्वच्छ करने का काम हो रहा है. लेकिन कुड़ू प्रखंड के बड़की चांपी पंचायत के मसुरियाखांड़ गांव के लोगों को स्वास्थ सुविधा तक नसीब नहीं है़ गांव से आठ किलोमीटर दूर बड़की चांपी में एक स्वास्थ उपकेंद्र है. जहां कुड़ू में कार्यरत चिकित्सकों को रोस्टर के आधार पर सप्ताह में एक दिन डि्यूटी करने की जिम्मेवारी दी गयी है़
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि बड़की चांपी स्वास्थ उपकेंद्र में भगवान का दर्शन हो जायेगा लेकिन चिकित्सक का दर्शन नहीं हो पायेगा. गांव से 18 किलोमीटर दूर कुड़ू में सामुदायिक स्वास्थ केंद्र है. इसके अलावा गांव से 15 किलोमीटर दूर लातेहार जिला के चंदवा में सामुदायिक स्वास्थ केंद्र है. गांव में जब कोई बीमार पड़ता है तो पहले उसका जड़ी-बूटी से इलाज किया जाता है. तबीयत ज्यादा खराब होने पर ओझा-गुणी से झाड़-फूंक कराया जाता है. जब हालत ज्यादा खराब हो जाता है तो मरीज को खटिया पर लाद कर बड़की चांपी या फिर जिलिंग ले जाया जाता है़ यहां से गाड़ी से परिजन मरीज को चंदवा या कुड़ू ले जाते हैं.
गांव के ग्रामीण ललका गंझू, लालजीत गंझू, कबूतरी देवी, मनतोरणी देवी, भुनेश्वर गंझू, फुलमनी देवी, विश्राम गंझू, प्रदीप गंझू, बिछिया देवी, नंदू गंझू, लोचन गंझू, शिवव्रत गंझू समेत अन्य ने बताया कि आज तक गांव में विधायक, सांसद से लेकर कोई भी जनप्रतिनिधि नहीं आया है़ एक बार कुड़ू के निवर्तमान बीडीओ विजय कुमार गांव आये थे.
ग्रामीणों ने उन्हें अपनी समस्या बतायी थी. तीन साल हो गया पर एक भी समस्या का समाधान नहीं हो पाया. ग्रामीणों ने एक साल पहले श्रमदान कर दो किलोमीटर तक सड़क का निर्माण किया था. लेकिन पहली बारिश में ही सड़क बह गयी. गांव तक पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है. सड़क के नाम पर जंगली व पहाड़ी पगडंडी, उबड़-खाबड़ रास्ते हैं. गांव के ग्रामीणों ने बताया कि लोहरदगा डीसी से लेकर मुख्यमंत्री तक को लिखित रूप से गांव की समस्या से अवगत कराया गया है लेकिन कोई पहल नहीं हुई. मसुरियाखांड़ गांव की आबादी 225 है. लेकिन गांव में मूलभुत सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है.
आजादी के 70 साल बाद बाद भी गांव के लोग आदिम युग में जीने को विवश हैं. दूसरी तरफ राज्य तथा केंद्र सरकार विकास की कई योजनाएं चला रही है. मसुरियाखांड़ गांव के संबध में कुड़ू बीडीओ संतोष कुमार ने बताया कि ग्रामीणों को मूलभूत सुविधा मुहैया कराना पहली प्राथमिकता है. मिट्टी-मोरम सड़क का निर्माण पंचायत से कराया जायेगा. सामुदायिक स्वास्थ केंद्र कुड़ू के प्रभारी चिकित्सा प्रभारी सुलामी होरो ने बताया कि समय-समय पर बड़की चांपी स्वास्थ केंद्र में जांच शिविर का आयोजन किया जाता है, चिकित्सक हमेशा रोस्टर के आधार पर केंद्र में जाते है़ं
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