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जिले मे महुआ की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है

जिले में महुआ की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है. मार्च से अप्रैल-मई तक जिले भर में महुआ का उत्पादन अधिक होता है.

तसवीर-8 लेट-7 महुआ चुनती महिला चंद्रप्रकाश सिंह. लातेहार. जिले में महुआ की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है. मार्च से अप्रैल-मई तक जिले भर में महुआ का उत्पादन अधिक होता है. इस डेढ़ माह के अंतराल में लातेहार जिले में लगभग 80 से 100 करोड़ रुपये से अधिक का महुआ का व्यवसाय होता है. जिले में महुआ के पेड़ बहुत मात्रा में पाये जाते हैं. जिले भर में लगभग 3 लाख से भी अधिक महुआ के पेड़ हैं. लेकिन इसकी अधिकारिक गिनती नही है. मौसम मे बदलाव से प्रभावित हो सकता है उत्पादन: महुआ ग्रामीणों के लिए नगदी फसल के रूप में माना जाता है. इसमे किसी प्रकार की पूंजी नही लगती है. ग्रामीणों का कहना है कि यह पूरी तरह प्रकृति प्रदत्त है. महुआ का सीजन आने के बाद महुआ के पेड़ में फल लगते हैं और खुद ही फल डाली से टूट कर जमीन पर गिरते हैं. इस फल को ग्रामीण इकट्ठा कर कड़ी धूप में सुखाते हैं और फिर उसकी बिक्री कर देते हैं. मौसम मे आये बदलाव से महुआ की खेती को नुकसान हो सकता है. क्याेंकि अत्यधिक गर्मी और धूप मे ही इसका फल पेड़ से गिरता है. ग्रामीणों ने कहा कि जंगल और गांव से महुआ जमा कर व्यवसायियों के पास बेचते हैं. बाद में व्यवसायी वर्ग के लोग महुआ को झारखंड से बाहर के बाजार में बेचते हैं. महुआ की सबसे बड़ी मंडी ओड़िशा और बंगाल में मानी जाती है. इसके अलावा देश के दूसरे हिस्सों में भी महुआ का निर्यात किया जाता है. वर्तमान समय में 40 से 45 से लेकर प्रति किलो की दर से महुआ की बिक्री हो रही है. बाद में इस महुआ को बड़ी मंडी में ऊंचे दाम पर बेची जाती है. क्या कहते है अधिकारी इस संबंध में जिला कृषि पदाधिकारी अमृतेश कुमार सिंह ने कहा कि महुआ ग्रामीणो के लिए वरदान के रूप में है जिससे उन्हे आर्थिक लाभ होता है. उन्होंने कहा कि मुहआ मार्च से लेकर अप्रैल-मई तक ही गिरता है. मौसम मे आये बदलाव से इसकी खेती प्रभावित हो जाती है. लेकिन बारिश होने पर इसे अधिक नुकसान होता है. इस समय बारिश नहीं हुई, तो महुआ की खेती को अधिक नुकसान की संभावना नहीं है.

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