न हाकिम, न वकील, फिर भी होते हैं फैसले
Updated at : 05 Dec 2015 11:39 PM (IST)
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सुनील कुमार लातेहार : लातेहार समाहरणालय परिसर में अवस्थित सर्वे कार्यालय मुंशी व पेशकार के हवाले हो गया है. एक ओर सरकार राज्य भर के एसएआर कोर्ट बंद करने का ऐलान कर चुकी है. दूसरी ओर सहायक बंदोबस्त पदाधिकारी का कोर्ट छह माह में भी यहां नहीं लगता है. सीएनटी की धारा 87 के तहत […]
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सुनील कुमार
लातेहार : लातेहार समाहरणालय परिसर में अवस्थित सर्वे कार्यालय मुंशी व पेशकार के हवाले हो गया है. एक ओर सरकार राज्य भर के एसएआर कोर्ट बंद करने का ऐलान कर चुकी है. दूसरी ओर सहायक बंदोबस्त पदाधिकारी का कोर्ट छह माह में भी यहां नहीं लगता है. सीएनटी की धारा 87 के तहत सर्वे से संबंधित वादों के निबटारा के लिए गठित एएसओ कोर्ट में कभी भी पदाधिकारी नहीं बैठते हैं. न तो कोर्ट के बाहर कोई सूचना पट्ट होता है, न ही कोर्ट का नाम ही दर्ज होता है.
एएसओ के टेबुल पर साइनबोर्ड टूटा-फूटा अवस्था में तब पाया गया, जब प्रभात खबर का प्रतिनिधि शनिवार को उक्त कार्यालय की खबर लेने पहुंचा. कार्यालय में सिर्फ एक महिला पेशकार एवं कुछ निजी मुंशी थे. ये ही सीएनटी की धारा 87 के तहत सुधारनामा दाखिल करते हैं. उक्त महिला कर्मी ने कहा कि पदाधिकारी सोमवार, मंगलवार एवं बुधवार को बंदोबस्ती मुख्यालय पलामू में बैठते हैं तथा शनिवार को गाड़ी नहीं चलने के कारण नहीं आ पाये है. सर्वे कोर्ट में यहां अधिवक्ताओं की सेवा नहीं ली जाती है.
न ही अधिवक्ता संघ द्वारा जारी किसी गाइड लाइन का अनुपालन ही किया जाता है. कब हाकिम आते हैं, कब बहस व दलीलें पेश की जाती है, यह मुंशी एवं पेशकार ही जानते हैं. अधिवक्ता संघ की स्टेशनरी का उपयोग नहीं होने से संघ को काफी आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही है. दूसरी अोर अधिवक्ताओं की फीस के पैसे मुंशी व पेशकार की जेब में जा रहे हैं.
चालू वर्ष में 187 मामलों का निष्पादन
आश्चर्य की बात यह है कि जिस कोर्ट में न हाकिम, न ही वकील रहते हैं, उस कोर्ट ने चालू वर्ष में 187 मामलों का फैसला दिया है. अधिकतर फैसलों के खिलाफ पक्षकार सिविल कोर्ट की अपील में चले गये हैं.
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