मानव तस्करी के आरोपी को 14 वर्ष का सश्रम कारावास

Updated at : 22 Feb 2018 4:56 AM (IST)
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मानव तस्करी के आरोपी को 14 वर्ष का सश्रम कारावास

सुनील कुमार लातेहार : द्वितीय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनिल कुमार पांडेय की अदालत ने मानव तस्करी के एक मामले में आरोपी को 14 वर्षों का सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माना की सजा सुनायी है. नेतरहाट थाना में दर्ज कांड संख्या 07‍/14 के शेषण ट्रायल के बाद सत्रवाद संख्या 277/2014 में आरोपी […]

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सुनील कुमार
लातेहार : द्वितीय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनिल कुमार पांडेय की अदालत ने मानव तस्करी के एक मामले में आरोपी को 14 वर्षों का सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माना की सजा सुनायी है. नेतरहाट थाना में दर्ज कांड संख्या 07‍/14 के शेषण ट्रायल के बाद सत्रवाद संख्या 277/2014 में आरोपी संतोष कोरवा पर आरोप सत्य पाया गया.
प्राथमिकी के अनुसार नेतरहाट थाना क्षेत्र के चार किशोरियों को आरोपी संतोष कोरवा ने 27 जून 2014 को नौकरी दिलाने के नाम पर बहला-फुसला कर दिल्ली ले गया था. बाद में किशोरियों ने अपने परिजनों को फोन कर बताया कि दिल्ली में संतोष कोरवा उनसे गलत काम कराना चाह रहा है. इसके बाद संतोष पर सोहरपाठ निवासी विनय प्रकाश आइंद ने मामला दर्ज कराया.
इसके बाद नेतरहाट पुलिस ने दिल्ली जाकर आरोपी को गिरफ्तार कर चारों किशोरियों को वापस लाकर लायी. इसके बाद आरोपी को जेल भेजा दिया गया. पुलिस ने मामले के अनुसंधान के बाद आरोपी संतोष कोरवा पर आरोप पत्र संख्या 11/2014 भादवि की धारा 370, 371 व 14 (एक) बालश्रम प्रतिषेध एवं विनिमयन अधिनियम 1986 के तहत आरोप पत्र अदालत में 23.08.14 को समर्पित किया था. अभियोजन पदाधिकारी बलराम साह ने श्री पांडेय की अदालत में कुल छह गवाहों को पेश किया था.
गवाहों ने मामले को सत्य पाया था, वहीं पीड़िताओं ने भी अपनी आपबीती अदालत को सुनायी थी. श्री पांडेय की अदालत ने आरोपी को भादवि की धारा 370 के तहत 14 वर्षों का सश्रम कारावास व पांच हजार रुपये जुर्माना और जुर्माना नहीं देने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास तथा 14 (एक) बालश्रम प्रतिषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986 के तहत एक वर्ष कारावास की सजा सुनायी है.
अदालत ने दोनों सजा साथ-साथ चलाये जाने का आदेश दिया है. अदालत ने संतोष कोरवा को बंधुआ मजदूरी कराने का पेशेवर आरोपी कहा है. ज्ञात हो कि मानव तस्करी के आरोप में पिछले 10 वर्षों इस तरह का फैसला नहीं आया था.
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