व्यवस्था से गांववालों का भरोसा उठा ग्रामसभा चाहती है अपना अधिकार

Updated at : 25 Feb 2018 1:41 AM (IST)
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व्यवस्था से गांववालों का भरोसा उठा ग्रामसभा चाहती है अपना अधिकार

खूंटी : के अड़की में कोचांग से आगे बंदगांव तक सड़क बनी है. हाल में बनी सड़क पर घास उग आये हैं. सड़क पर बड़े-बड़े पत्थर बिखरे हैं. इस रास्ते पर चलना मुश्किल है. यह सरकारी योजनाओं की सच्चाई है. अड़की के घनघोर जंगलों में सरकार की योजनाएं ऐसे ही पूरी हो रही हैं. कोचांग […]

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खूंटी : के अड़की में कोचांग से आगे बंदगांव तक सड़क बनी है. हाल में बनी सड़क पर घास उग आये हैं. सड़क पर बड़े-बड़े पत्थर बिखरे हैं. इस रास्ते पर चलना मुश्किल है. यह सरकारी योजनाओं की सच्चाई है. अड़की के घनघोर जंगलों में सरकार की योजनाएं ऐसे ही पूरी हो रही हैं. कोचांग से बायीं ओर भी एक सड़क बनी है, उसका भी यही हाल है.

अड़की के दुरूह जंगलों में बसे तुतकोड़ा, शाके, समदा, कोचांग, कुरूंगा, मनहातू, टुबिल, लदीबेरा आदि गांवों में विकास की सारी बातें बेमानी है. इन गांवाें के गोद में गरीबी, बदनसीबी बसती है. लोग अपने संसाधनों से जैसे-तैसे जीवन बसर कर रहे हैं.

प्रभात खबर ने जब इन गांवों में बुनियादी सुविधाओं का जायजा लिया, तो विकास की सच्चाई सामने आयी. इन गांवों तक पहुंचना आसान नहीं है.
व्यवस्था से गांववालों का…
किसी तरह गांव तक पहुंच भी गये, तो विकास के खोखले दावे नजर आयेंगे. गांव में न तो पीने का पानी, ना बिजली, ना आसपास स्वास्थ्य सुविधा. गरीबी से लड़ते हुए स्कूलों में बच्चे किसी तरह पढ़ाई करते दिखेंगे. इन गांवों की पंचायत में ग्रामसभा ने अपने अधिकार का एलान यूं ही नहीं किया है. व्यवस्था से इनका भरोसा उठ गया है. पठारी नाले-नदी का पानी पीते हैं. जानवर और आदमी एक ही जगह से पानी पी रहे हैं. ऐसी ही बदहाली-बदनसीबी पर ग्रामीण आक्रोशित हैं.
ग्रामसभा अपना अधिकार मांग रही है. अड़की से बीरबांकी का 12-15 किमी का रास्ता चलने लायक नहीं है. कुरूंगा गांव तक तो जाने के लिए उबड़-खाबड़ जैसे-तैसे रास्ते बनाये गये हैं. कोरबा-बड़ानी रोड पर काम चल रहा है, लेकिन कब पूरा होगा, ग्रामीण भी बताने में असमर्थ हैं. कई सड़कों का निर्माण कार्य भी चल रहा है. नयी सड़क बन रही है और टूट भी रही है. इनकी गुणवत्ता देखने वाला कोई नहीं है़
जंगल में गरीबी, बेबसी विकास के नाम पर धोखा
खूंटी के अड़की में घने जंगलों में बसे गांवों में पठारी नाले-नदी का पानी पीते हैं लोग
गांवों से बाहर निकलने के लिए सड़क नहीं, मीलों चल कर बच्चे जाते हैं स्कूल
विकास की सच्चाई
बीरबांकी के सीमाने पर स्कूल के लिए 12 एकड़ 56 डिसमिल जमीन राज्यपाल के नाम दान की गयी है. स्कूल बना, तो कुछ माह में ही उग्रवादियों ने उड़ा दिया. फिलहाल यहां पुलिस का अस्थायी कैंप चल रहा है. स्कूल दोबारा नहीं बना.
इन इलाकों में जमीन लेना अासान नहीं है. खूंटकट्टी व्यवस्था कायम है. आसपास के बच्चे मीलों चल कर स्कूल आते हैं.
अड़की प्रखंड की चुकलू सीमा पर पिछले दो सालों से अस्पताल बन रहा है. काम अब तक पूरा नहीं हुआ है. इलाके में स्वास्थ्य सुविधाओें का बुरा हाल है. लोगों को खूंटी आना पड़ता है.
जागरूक नहीं हैं लोग
इन इलाकों के लोगों को सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, कृषि, कल्याण, आपदा विभाग से चलनेवाली दर्जनों योजनाओं के बारे में जानकारी नहीं है.
वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, पारिवारिक सुरक्षा, नि: सहायों को मिलनेवाली आर्थिक मदद की भी जानकारी ग्रामीणों को नहीं है
प्रखंड के लोग घर-घर पहुंच कर या कैंप लगा कर सूची बनाते हैं. दस्तावेज लेकर कोई प्रखंड नहीं आता
ग्रामीणों के पास आधार कार्ड से लेकर बैंक के खाते तक नहीं होते
फसल बीमा हो या फिर आपदा के लिए मिलनेवाला मुआवजा, प्रखंड के कर्मियों की पहल से ही मिल पाती है
1997 से शुरू हो गयी थी झारखंड के गांवों में पत्थलगड़ी
झा रखंड के गांवों में पत्थलगड़ी 1997 से ही शुरू हो गयी थी. भारत जन आंदोलन के तत्वावधान में डॉ बीडी शर्मा, बंदी उरांव सहित अन्य लोगों के नेतृत्व में खूंटी, कर्रा सहित कई जिलों के दर्जनों गांवों में पत्थलगड़ी की गयी थी. इसके बाद झारखंड (एकीकृत बिहार) के गांवों में एक अभियान की तरह शिलालेख (पत्थलगड़ी) रामे की स्थापना की जाने लगी. डॉ बीडी शर्मा, बंदी उरांव, पीएनएस सुरीन सहित अन्य लोग इस काम में जुटे. गांवों में जागरूकता अभियान चलाया गया. पत्थलगड़ी पूरे विधि विधान के साथ की जाने लगी. पत्थलगड़ी समारोह चोरी छिपे नहीं, बल्कि समारोह आयोजित करके किया जाता था. इसकी सूचना प्रशासन को दी जाती थी. खूंटी सहित अन्य जिलों में आज भी उस समय की पत्थलगड़ी को देखा जा सकता है.
डॉ बीडी शर्मा ने अपनी पुस्तिका ‘गांव गणराज्य का स्थापना महापर्व’ में लिखा है कि 26 जनवरी से दो अक्तूबर 1997 तक गांव गणराज्य स्थापना महापर्व के दौर में हर गांव में शिलालेख की स्थापना अौर गांव गणराज्य का संकल्प लिया जायेगा. उन्होंने लिखा है कि हमारे गांव को 50 साल के बाद असली आजादी मिली है. यह साफ है कि आजादी का अर्थ मनमाना व्यवहार नहीं हो सकता है. उन्होंने लिखा है कि जब हमारा समाज हमारे गांव में हमारे राज की घोषणा करते हुए व्यवस्था की बागडोर अपने हाथ में ले लेता है, तो उसके बाद हर भली-बुरी बात के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होगा अौर उसी की जवाबदेही होगी. दूसरे लोग यहां तक कि सरकार भी हमसे पूछ सकती है कि अब तो हर मामले में आप लोग खुद मुख्तार हो गये, तो यह गलत बात हुई कैसे? हमारे गांव में हमारा राज स्थापित होने के बाद हम नये युग में प्रवेश कर रहे हैं, जिसमें बाहर के बंधन टूटेंगे, मगर हमारे ऊपर हर बात को विवेकपूर्ण ढंग से चलाने की बड़ी जिम्मेदारी भी होगी.
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