400 वर्षों से हो रही पहाड़पुर में काली पूजा

Published at :30 Oct 2016 4:23 AM (IST)
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400 वर्षों से हो रही पहाड़पुर में काली पूजा

नाला : प्रखंड के पूर्वांचल स्थित अफजलपुर पंचायत अंतर्गत पहाड़पुर गांव की काली बाड़ी मंदिर चार सौ वर्ष से भी पूर्व की है. विदित हो कि आस्था और विश्वास का केंद्र बना यह पहाड़पुर की प्राचीन काली बाड़ी मंदिर एवं इसमें स्थापित विराजमान माता काली की अलौकिक शक्ति एवं चमत्कार के कारण आज भी प्रत्येक […]

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नाला : प्रखंड के पूर्वांचल स्थित अफजलपुर पंचायत अंतर्गत पहाड़पुर गांव की काली बाड़ी मंदिर चार सौ वर्ष से भी पूर्व की है. विदित हो कि आस्था और विश्वास का केंद्र बना यह पहाड़पुर की प्राचीन काली बाड़ी मंदिर एवं इसमें स्थापित विराजमान माता काली की अलौकिक शक्ति एवं चमत्कार के कारण आज भी प्रत्येक शनिवार तथा मंगलवार को विशेष पूजा अर्चना श्रद्धालुओं द्वारा की जाती है.

आज भी काफी संख्या में लोग प्रतिदिन असाध्य रोगों से मुक्ति पाने तथा अन्य सांसारिक समस्याओं से निजात पाने की कामना लेकर काली बाड़ी माता के दरबार में आते हैं. बताया जाता है कि वर्तमान में कविराज वशंजों द्वारा इस मंदिर की देखभाल तथा माता की नित्य पूजा अर्चना की जाती है. विदित हो कि मंदिर में अंकित शीलालेख के आधार तथा कविराज परिवार के मुताबिक यह मंदिर 400 वर्ष से भी पुराना है. यूं तो शीलालेख में 1344 ई अंकित है.

कविराज वंशज ने बताया कि इस प्राचीन काल की काली बाड़ी मंदिर का वर्तमान पूजारी बंगाल के बड़कोला निवासी पंडित अविनाश भट्टाचार्य है. विदित हो कि आज भी इस प्राचीन मंदिर में स्थापित माता की गाथा एवं आस्था का प्रकाश हजारों लोगों के हृदय पटल पर विराजमान है. माता की चमत्कारी गुणों के कारण इस मंदिर में केवल झारखंड के ही नहीं बल्कि अन्य राज्यो से भी हजारों श्रद्धालु माता के मंदिर में अपनी समस्याओं के निदान की कामना लेकर आते हैं.

मान्यता यह भी है कि वर्तमान में कविराज परिवार के द्वारा माता के आदेशानुसार विभिन्न असाध्य रोगों व अन्य समस्याओं के निदान हेतु भक्तों व याचको को जड़ी बुटिया प्रसाद व आशिर्वाद के रूप में प्रदान किया जाता है, जिसे ग्रहण कर याचको की समस्याएं दूर हो जाती है. ज्ञात हो कि प्रति वर्ष हजारो लोग इस मंदिर में मनोकामना पुरी होने के पश्चात मुंडन व अन्य संस्कार कराते हैं जो कि इस प्राचीन मंदिर में स्थापित माता की चमत्कार और आस्था का परिचायक है.

कहते हैं आज तक कोई भी याचक माता के दरबार से निराश नहीं लौटा है. जाग्रत देवी होने के कारण बड़े बड़े राजनेता व उच्चाधिकारी भी माता के दरबार में माथा टेकने व आशिर्वाद प्राप्त करने आते हैं. इस मंदिर में प्राचीन काल से ही बलि प्रथा प्रचलित है. काली पूजा को लेकर पूरे क्षेत्र में भक्तिमय उत्सवी माहौल है.

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