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बड़कागांव : नहाए खाए के साथ छठ महाव्रत शुरू, सोमवार को खरना

Updated at : 11 Nov 2018 6:12 PM (IST)
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बड़कागांव : नहाए खाए के साथ छठ महाव्रत शुरू, सोमवार को खरना

बड़कागांव : बड़कागांव प्रखंड तथा आसपास के क्षेत्रों में रविवार को नहाय-खाय के साथ महापर्व छठ की शुरुआत हो गयी. चार दिवसीय इस लोक आस्था के अनुष्ठान पर विधि विधान के साथ लोगों ने पूजा पाठ शुरू किया. छठ व्रती सुबह से ही गंगा स्नान करने के बाद अपने-अपने घरों में प्रसाद बनाते दिखे. आज […]

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बड़कागांव : बड़कागांव प्रखंड तथा आसपास के क्षेत्रों में रविवार को नहाय-खाय के साथ महापर्व छठ की शुरुआत हो गयी. चार दिवसीय इस लोक आस्था के अनुष्ठान पर विधि विधान के साथ लोगों ने पूजा पाठ शुरू किया. छठ व्रती सुबह से ही गंगा स्नान करने के बाद अपने-अपने घरों में प्रसाद बनाते दिखे. आज के दिन छठ व्रत करने वाले श्रद्धालुओं ने दाल-चावल के साथ कद्दू की सब्जी को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया.

स्नान के बाद कद्दू, चने की दाल, चावल तैयार कर व्रतियों के साथ ही श्रद्धालु भी प्रसाद के रूप में ग्रहण किये. सोमवार को लोहंडा (खरना) व्रती दिन भर उपवास रखने के बाद शाम को गन्ने के रस में बने चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी का प्रसाद भगवान सूर्य को अर्पित करने के बाद ग्रहण करेंगे.

इसके बाद 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होगा. मंगलवार को पहला अर्घ्य शाम 5.10 के पहले भगवान सूर्य को दिया जायेगा. वहीं बुधवार को दूसरा अर्ध्य सुबह 6:15 के पूर्व दिया जायेगा और उसके बाद व्रती पारण करेंगे. सोमवार को खरना होने से साढ़े साती और ढैया से प्रभावित लोगों के लिए भी काफी उत्तम संयोग है. खरना का प्रसाद ग्रहण करना उनके लिए विशेष फलदायी होगा.

बड़कागांव में खरना के लिए उमड़ती है भीड़

हजारीबाग जिले के बड़कागांव प्रखंड में खरना का काफी महत्व है. लोग इसे आस्था का महापर्व मानते हैं. लोगों का विश्वास है कि खरना का प्रसाद ग्रहण करने से लोगों की मुरादें पूरी होती हैं. यहां देखा जाता है कि यहां कई ऐसे मुस्लिम भाई लोग भी हैं जो खरना का प्रसाद छठ व्रतियों के घरों में जाकर ग्रहण करते हैं. इसीलिए खरना प्रसाद ग्रहण करने के लिए आम लोगों की भीड़ उमड़ती है. लोग हर छठ वर्तियों के घरों में जा-जाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं और अपने परिजनों के लिए प्रसाद घर लाते हैं.

खरना का मतलब शुद्धीकरण

खरना का मतलब शुद्धिकरण होता है. मान्यता है कि कुलदेवता को चढ़ाये जाने वाले खीर को व्रती स्वयं अपने हाथों से पकाते हैं. इसके लिए मिट्टी के नये चूल्हे का प्रयोग किया जाता है. खीर पकाने के लिए शुद्ध अरवा चावल या साठी के चावल का प्रयोग होता है. इंधन के रूप में सिर्फ आम की लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है. आम की लकड़ी का प्रयोग करना उत्तम माना गया है.

खरना पूजन के बाद व्रती पहले स्वयं प्रसाद ग्रहण करते हैं. इस दौरान किसी प्रकार की आवाज नहीं होनी चाहिए. किसी प्रकार की आवाज आने पर या व्रती के मुख में कोई कंकड़ मिल जाने पर व्रती खरना करना छोड़ देते हैं. खरना पूजन में एक बार भोजन कर लेने के बाद व्रती को कुछ भी खाना-पीना नहीं होता है.

संध्या अर्घ्य और सुबह का अर्घ्य देने के बाद ही व्रती व्रत का परायण करते हैं. खरना के बाद व्रती दो दिनों तक साधना में होते हैं जिसमें उन्हें पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए भूमि पर शयन करना होता है. इसके लिए सोने के स्थान को अच्छे से साफ सुथरा करके पवित्र किया जाता है और स्वच्छ बिस्तर बिछाया जाता है.

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