गुमला में दुर्गोत्सव : पालकोट का दशभुजी मंदिर विश्व विख्यात, दुर्गा पूजा की 260 वर्ष पुराना इतिहास

इतिहास गवाह है. गुमला के नागवंशी राजा अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिए देवी देवताओं की पूजा करते थे. कई ऐसे मंदिर हैं, जो प्राचीन हैं. जहां वर्षो से पूजा होते आ रही है
जगरनाथ पासवान, गुमला इतिहास गवाह है. गुमला के नागवंशी राजा अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिए देवी देवताओं की पूजा करते थे. कई ऐसे मंदिर हैं, जो प्राचीन हैं. जहां वर्षो से पूजा होते आ रही है. आज भी श्रद्धा का केंद्र है. इन्हीं में झारखंड प्रदेश के अंतिम छोर पर बसे गुमला जिले में शक्तिस्वरूपा मां दुर्गा पूजा का इतिहास काफी प्राचीन है. नागवंशी राजाओं ने जिले के पालकोट प्रखंड में सर्वप्रथम दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी. नागवंशी राजाओं द्वारा निर्मित मंदिर व मूर्ति आज भी पालकोट में साक्षात है. आज भी यहां दुर्गा पूजा की अपनी महत्ता है. नागवंशी महाराजा यदुनाथ शाह ने 1765 में दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी. यदुनाथ के बाद उनके वंशज विश्वनाथ शाह, उदयनाथ शाह, श्यामसुंदर शाह, बेलीराम शाह, मुनीनाथ शाह, धृतनाथ शाहदेव, देवनाथ शाहदेव, गोविंद शाहदेव व जगरनाथ शाहदेव ने इस परंपरा को बरकरार रखा. उस समय मां दशभुजी मंदिर के समीप भैंस की बली देने की प्रथा थी. परंतु जब कंदर्पनाथ शाहदेव राजा बने, तो उन्होंने बली प्रथा समाप्त कर दी. दुर्गा पूजा 260 वर्ष पुरानी है. परंतु आज भी पालकोट का दशभुजी मंदिर विश्व विख्यात है. यहां दूर दूर से श्रद्धालु आते हैं. मां दशभुजी से दिल से मांगी गयी मुराद पूरी होती है. दशभुजी मंदिर के समीप घनी आबादी के अलावा समीप में एक प्राचीन तालाब भी है. पालकोट में कई ऐसे धरोहर है. जो प्राचीन है. आज भी यहां माता देवी की पूजा की कई परंपरा प्राचीन है. पालकोट से सुग्रीव का भी इतिहास जुड़ा हुआ है. क्योंकि, यहां सुग्रीव गुफा है. इसलिए इस क्षेत्र में धार्मिक कार्यक्रम हर साल पूरे श्रद्धा के साथ होता है. पालकोट मुख्यालय के अलावा अब कई स्थानों मां की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है. पालकोट पौराणिक व धार्मिक स्थल है समाज सेवी संतोष कुमार गुप्ता गुडडू ने कहा है कि पालकोट पौराणिक, धार्मिक व ऐतिहासिक धरोहरों का जीता जागता उदाहरण है. यहां प्राचीन ऋष्यमुख पर्वत है, जो आज भी यह साक्षात है. यहां मलमली गुफा है. जहां राजा बलि के डर से सुग्रीव छिपकर रहते थे. यह गुफा आज भी रामायण युग की कहानी बयां करती है. पहाड़ की चोटी पर शबरी आश्रम है. जहां श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण के साथ आये थे. पालकोट से होते हुए ही भगवान श्रीराम रामरेखा धाम गये थे. मतंगमुनी का शंख आज भी पहाड़ पर है यहां ऋष्यमुख पर्वत की चोटी है. जहां माता शबरी की कुटिया थी. जिसे अब मंदिर का रूप दे दिया गया है. यहां मतंगमनी भी रहते थे. मतंगमनी का शंख आज भी यहां रखा हुआ है जो रामायण युग की कहानी कहती है. इसके अलावा शीतलपुर, मलमलपुर, पवित्र निर्झर, घोड़लत्ता, हनुमान मंडा, गोबरसिल्ली, राकस टंगरा, मुनीडेरा, राकस टुकू, पंपा सरोवर, सुग्रीव टुकू, शबरी गुफा, मतंगमुनी का शंख है. यह सभी धरोहर रामायण युग के समय का है.
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