सुषमा बड़ाइक बरी: गवाहों की अनुपस्थिति और बयानों में विरोधाभास का मिला लाभ, 2010 में दर्ज हुआ था मामला

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अदालत से बरी होने के बाद बाहर निकलती सुषमा बड़ाइक

प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 2010 के रंगदारी और आपराधिक साजिश मामले में पद्मा उर्फ सुषमा बड़ाइक को बरी कर दिया है. गवाहों के न्यायालय में हाजिर न होने और बयानों में विरोधाभास को मामले में महत्वपूर्ण माना गया. यह फैसला 16 साल बाद आया है.

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गुमला. वर्ष 2010 में गुमला टाउन थाना में दर्ज रंगदारी व आपराधिक साजिश के मामले में पद्मा उर्फ सुषमा बड़ाइक को प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (पीडीजे) की अदालत ने बरी कर दिया. इस मामले में पुलिस की ओर से सुषमा बड़ाइक पर गंभीर आरोप लगाये गये थे और कार्रवाई के दौरान उनके पास से हथियार बरामद होने की बात कही गयी थी. हालांकि सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस साक्ष्य के साथ साबित करने में विफल रहा. कई गवाहों के न्यायालय में उपस्थित नहीं होने और कुछ गवाहों के बयानों में विरोधाभास सामने आने का लाभ सुषमा को मिला.

क्या है मामला

गुमला टाउन थाना में चार अगस्त 2010 को कांड संख्या 213/2010 दर्ज किया गया था. प्राथमिकी में भारतीय दंड संहिता की धारा 387 और 120बी के तहत कार्रवाई की गयी थी. पुलिस के अनुसार मामला कथित रूप से झारखंड आर्मी नामक संगठन के संचालन तथा कारोबारियों और अन्य लोगों से लेवी व रंगदारी वसूली से जुड़ा था. पुलिस की जांच में सुषमा बड़ाइक की भूमिका भी सामने आने का दावा किया गया था. लेकिन न्यायालय से सुषमा को इस मामले में इंसाफ मिला और वह बरी हो गयी.

एक साल जेल में रहने के बाद जमानत पर थी

16 साल पूर्व मामले की जांच के क्रम में पुलिस ने सुषमा बड़ाइक को गिरफ्तार किया था. उनके पास से हथियार बरामद होने की बात भी पुलिस की कार्रवाई में सामने आयी थी. गिरफ्तारी से पहले उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था. इसके बाद जनवरी 2011 में गुमला पुलिस ने उन्हें रांची से गिरफ्तार किया था. एक साल जेल में रहने के बाद सुषमा जमानत पर थी.

सुनवाई में कमजोर पड़ा अभियोजन पक्ष

मामले की सुनवाई आगे बढ़ने के साथ अभियोजन पक्ष के लिए आरोपों को साबित करना चुनौती बनता गया. अदालत में कई गवाह उपस्थित नहीं हुए. वहीं जिन गवाहों के बयान दर्ज हुए, उनमें से कुछ के बयान पूर्व में दर्ज कथनों से मेल नहीं खाये. गवाहों के बयानों में विरोधाभास के कारण अभियोजन की कहानी को अपेक्षित मजबूती नहीं मिल सकी.

अधिवक्ता ने कहा

बचाव पक्ष की ओर से मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता मुशाहिद आजमी उर्फ पम्मू ने बताया कि सुनवाई के दौरान कई साक्षी न्यायालय में उपस्थित नहीं हुए. वहीं कई गवाहों के बयान में विरोधाभास रहा. ऐसी स्थिति में अभियोजन पक्ष आरोपों को प्रमाणित करने में विफल रहा और इसका लाभ सुषमा बड़ाइक को मिला.

साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने सुनाया फैसला

अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और अभियोजन पक्ष द्वारा आरोपों को साबित करने की स्थिति पर विचार करने के बाद सुषमा बड़ाइक को बरी कर दिया. इस फैसले के साथ वर्ष 2010 में दर्ज रंगदारी और आपराधिक साजिश का यह मामला करीब 16 वर्ष बाद न्यायिक रूप से समाप्त हो गया. सुषमा बड़ाइक ने कहा : अदालत से बरी होने का अर्थ यह है कि इस मामले में अभियोजन आरोपों को दोष सिद्धि के लिए आवश्यक स्तर तक साबित नहीं कर सका. हथियार बरामदगी समेत पुलिस की ओर से लगाये गये आरोप झूठे साबित हुए. मुझे न्यायालय पर भरोसा था. यही वजह है कि मुझे आज 16 साल पुराने केस से बरी मिल गयी.


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दुर्जय पासवान

लेखक के बारे में

By दुर्जय पासवान

दुर्जय पासवान ने वर्ष 2001 से पत्रकारिता की शुरुआत की. दैनिक जागरण में दो साल काम करने के बाद 2003 में वे प्रभात खबर से जुड़े. इसके साथ ही नयी दुनिया अखबार, प्रहार मैगजीन में भी अपनी सेवा दी. इसके बाद 2010 में वे दैनिक भास्कर गुमला का ब्यूरो इंचार्ज के रूप में काम शुरू किये. भास्कर में पांच साल सेवा देने के बाद दोबारा 2014 में प्रभात खबर में ब्यूरो इंचार्ज के रूप में वापसी की. तब से अबतक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उन्होंने नक्सलियों से जुड़ी खबरें, नक्सली घटनाएं, ग्राउंड रिपोर्ट, प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज से संबंधित खबरों पर अच्छा काम किया. इन्हीं खबरों ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान दी. दुर्जय पासवान बहुत लगन से अपना सभी काम का पूरा करते हैं.

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