संत इग्नासियुस का जीवन प्रेरणास्रोत : फादर ललित

Updated at : 31 Jul 2025 10:23 PM (IST)
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संत इग्नासियुस का जीवन प्रेरणास्रोत : फादर ललित

जारी व डुमरी में मनाया गया संत इग्नासियुस का पर्व

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जारी/डुमरी. जिले के जारी व डुमरी प्रखंड में संत इग्नासियुस लोयोला का पर्व धूमधाम से मनाया गया. मौके पर चर्च में मिस्सा पूजा हुई. पुरोहितों ने पूजा करायी और संत इग्नासियुस लोयोला के संघर्ष की कहानी बताते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने की अपील की. जारी प्रखंड के बारडीह पारिस में गुरुवार को हजारों की संख्या में ख्रीस्तीय विश्वासियों ने संत इग्नासियुस का पर्व श्रद्धा, उल्लास से मनाया. इस विशेष अवसर पर सबसे पहले चर्च परिसर में विशेष मिस्सा पूजा हुई. मिस्सा पूजा में मुख्य अधिष्ठाता फादर ललित जोन एक्का, सहयोगी के रूप में फादर अलेक्जेंडर तिर्की ने निभायी. मिस्सा पूजा के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन बारडीह विद्यालय परिसर में किया गया. इस दौरान बच्चों व युवाओं ने पारंपरिक गीतों व रंगारंग नृत्यों की प्रस्तुतियां देकर उपस्थित लोगों का मन मोह लिया. फादर ललित जोन एक्का ने कहा कि यह पर्व हमें संत इग्नासियुस की शिक्षाओं व आदर्शों की याद दिलाता है. उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ईश्वर की महिमा व मानव सेवा को समर्पित किया था. हमें भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर समाज में सकारात्मक कार्य करना चाहिए. फादर अलेक्जेंडर तिर्की ने कहा कि कैथोलिक समाज में जागरूकता व सेवा भावना को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया. कार्यक्रम के सफल आयोजन में पारिस समिति, विद्यालय के शिक्षक समेत स्थानीय लोगों ने सराहनीय भूमिका निभायी.

संघर्ष से भरा हुआ है संत इग्नासियुस का जीवन : फादर ख्रीस्तोफर

डुमरी. प्रखंड के आरसी चर्च नवाडीह में संत इग्नासियुस लोयोला का पर्व मनाया गया. मुख्य अधिष्ठता फादर ख्रीस्तोफर डुंगडुंग की अगुवाई में मिस्सा पूजा हुई. फादर ख्रीस्तोफर ने कहा कि संत इग्नासियुस का जन्म सन 1491 में फ्रांस के लोयला गढ़ के एक राजकीय परिवार में हुआ था. वे 11 भाई-बहनों में सबसे छोटा था. राजकीय कुलीन परिवार में होने के नाते सुख-सुविधा व ठाठ बाठ से जीवन जीता था. राजकीय परिवार में रहते हुए सैनिक बने. युद्ध में दाहिना पैर जख्मी हो गया. इसके बाद अस्पताल में इलाज के दौरान संतों की जीवनी, पवित्र बाइबल पढ़े. संतों की जीवनी पुस्तक पढ़ कर उनका मन परिवर्तन हो गया. अपनी तलवार मां मरियम के चरणों पर रख कर वे निकल पड़े. महीनों तक मनरेसा की गुफा में घोर तपस्या मनन, चिंतन व प्रार्थना की. वह प्रतिदिन अपने अनुभव व प्रार्थना से पायी कृपा दानों को एक डायरी में लिखा करते थे. यही डायरी आगे चल कर आध्यात्मिक साधना की पुस्तिका बनी. पुरोहित बनने के लिए लैटिन भाषा की पढ़ाई की. उनका पूरा जीवन संघर्ष से भरा हुआ है. मौके फादर पिंगल कुजूर, फादर ब्यातुष किंडो, फादर देवनीश एक्का, फादर भलेरियस लकड़ा, फादर जय मसीह, सिस्टर वेरनासिया, सिस्टर फ्लोरा आदि मौजूद थे.

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