पहान करते हैं पूजा की शुरुआत

आंजन गांव की गुफा में हनुमान का जन्म हुआ था. आंजन में कई ऐतिहासिक धरोहर हैं. पहाड़ पर स्थित मंदिर में हनुमान अपनी मां की गोद में बैठे हैं. गुमला : गुमला से 21 किमी दूर आंजन गांव है़ यहां के लोग आज भी अपने आपको हनुमान का वंशज कहते हैं. इसमें सच्चाई भी है. […]
आंजन गांव की गुफा में हनुमान का जन्म हुआ था. आंजन में कई ऐतिहासिक धरोहर हैं. पहाड़ पर स्थित मंदिर में हनुमान अपनी मां की गोद में बैठे हैं.
गुमला : गुमला से 21 किमी दूर आंजन गांव है़ यहां के लोग आज भी अपने आपको हनुमान का वंशज कहते हैं. इसमें सच्चाई भी है. कहा जाता है कि अंजनी मां जब गर्भ से थी, तो वह आंजन गांव के गुफा में ही ठहरी थी. गुफा में ही बालक हनुमान का जन्म हुआ था. इसका उल्लेख रामायण में है.
आज जरूर आंजन गांव गुमनाम हो विकास की बाट जोह रहा है, लेकिन आज भी इस क्षेत्र के लोग अपने आपको भाग्यशाली मानते हैं कि उनका जन्म ऐसे गांव में हुआ है, जहां श्रीराम भक्त हनुमान का जन्म हुआ था. यही वजह है कि रामनवमी में यहां की पूजा पद्धति सभी से भिन्न होती है. पूर्वजों के जमाने से चली आ रही परंपरा के अनुसार गांव के बैगा, पहान व पुजार सबसे पहले पूजा करते हैं. गांव में एक अखाड़ा है, जहां महावीरी झंडा गाड़ा जाता है. जिस प्रकार हनुमान कमर में लंगोटा बांधते थे, उसी प्रकार बैगा, पहान व पुजार सफेद रंग की धोती पहन कर अखाड़ा में आते हैं. उनके ऊपर का शरीर पूरी तरह खुला रहता है.
जुटते हैं 30 गांव के 20,000 लोग
आंजन में परंपरा के अनुसार तीन दिनों तक ऐतिहासिक मेला लगता है. 100 साल पुराना मेला का इतिहास है. यहां 30 गांव के लगभग 20 हजार लोग जुटते हैं. मेला एक घंटे के लिए लगता है. इसके बाद रात में प्रसिद्ध हनुमान चाकडीपा में अस्त्र शस्त्र चालन प्रतियोगिता आयोजित होती है़ इसमें हरेक गांव के लोग पारंपरिक हथियार के साथ से भाग लेते हैं.
दो बजे के बाद धार्मिक फिल्म दिखायी जाती है. इसमें हनुमान के जन्म से लेकर लंका विजय तक की कहानी रहती है. पूजा कमेटी के अध्यक्ष अशोक शर्मा ने कहा झारखंड राज्य सहित छत्तीसगढ़, ओड़िशा व बिहार के लोग आते हैं. आंजन में कई ऐतिहासिक धरोहर हैं, जो आज भी साक्षात हैं. मुख्य मंदिर आंजन गांव से तीन किमी दूर पहाड़ की चोटी पर है. आसपास घने जंगल हैं. सर्प गुफा, धमधमिया पहाड़ है. सबसे दिलचस्प बात कि देश का पहला हनुमान की मूर्ति आंजन गांव में है़
मशाल जला कर निकलता था जुलूस
गुमला में 1932 से रामनवमी पर जुलूस निकालने की प्राचीन परंपरा है. रामनवमी पर्व की शुरुआत की कहानी भी ऐतिहासिक है. उस जमाने में गुमला छोटा कस्बा था. तलवार, लाठी, डंडा व भाला नहीं होता था. लकड़ी का गदा बना कर लोग निकलते थे. गदा से ही जुलूस में करतब दिखाया जाता था.
हनुमान की जन्मस्थली होने के कारण अधिकतर लोग हनुमान के वेश में निकलते थे. बिजली नहीं थी. मशाल की रोशनी में जुलूस निकलता था. खेल का प्रदर्शन पेट्रोमेक्स की रोशनी में होता था. अखाड़ा सजता था. उसमें पहलवान लड़ते थे.
गदा से भी लड़ाई होती थी. उस समय एक अखाड़ा होता था. घाटो बगीचा स्थित मंदिर में उस समय अखाड़ा लगता था और आसपास के लोग जुटते थे. उस समय टोहन बाबू, मथुरा प्रसाद सिन्हा, फतेहचंद मंत्री, छेदी केसरी, गयादत्त पांडेय, गंगा महाराज तिवारी, रघुवीर साहू ने गुमला में रामनवमी का जुलूस निकालने की परंपरा की शुरुआत की थी़ वहीं दलजीत गुप्ता, मंतु राम, महावीर राम खेल का प्रदर्शन किया करते थे. ये लोग उस समय के जाने माने खिलाड़ी थे. इसके बाद 1964 से गुमला में झांकी निकालने की परंपरा की शुरुआत हुई. झांकी निकालने में भी प्रतिस्पर्धा होती थी.
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