फील्ड फायरिंग रेंज का विरोध

Published at :23 Mar 2016 5:09 AM (IST)
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फील्ड फायरिंग रेंज का विरोध

हर वर्ष होती है 22 व 23 मार्च को विरोध सभा गुमला : जा न देंगे, जमीन नहीं देंगे. जल, जंगल, जमीन हमारा है व विस्थापन बरदाश्त नहीं करेंगे के नारों से टुटुवापानी गूंज उठा. बिशुनपुर, नेतरहाट व महुआडाड़ के बॉर्डर पर स्थित टुटुवापानी में हजारों लोग जुटे. पायलट प्रोजेक्ट नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के […]

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हर वर्ष होती है 22 व 23 मार्च को विरोध सभा
गुमला : जा न देंगे, जमीन नहीं देंगे. जल, जंगल, जमीन हमारा है व विस्थापन बरदाश्त नहीं करेंगे के नारों से टुटुवापानी गूंज उठा. बिशुनपुर, नेतरहाट व महुआडाड़ के बॉर्डर पर स्थित टुटुवापानी में हजारों लोग जुटे. पायलट प्रोजेक्ट नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के विरोध में नारेबाजी की.
पूर्व विधायक भूषण तिर्की ने कहा कि फील्ड फायरिंग रेंज बनने से गुमला व लातेहार जिले के 245 गांव के लोग विस्थापित होंगे. इसमें महुआडांड़ के 52, बिशुनपुर के 70, चैनपुर प्रखंड के 46, डुमरी प्रखंड के 30, घाघरा प्रखंड के 42 व गुमला प्रखंड के पांच गांव शामिल हैं.
पूर्व में सैनिकों ने इस क्षेत्र की जनता के साथ शोषण किया है. अब अत्याचार, शोषण बरदाश्त नहीं किया जायेगा. मेरे शरीर में जब तक खून का एक-एक कतरा है, फील्ड फायरिंग रेंज को बनने नहीं देंगे. इधर, टुटुवापानी में गुमला व लातेहार जिला के एक सौ से अधिक गांव के लोग पहुंचे.
1993 से चल रहा है आंदोलन
1965 में नेतरहाट पठार क्षेत्र में तोप अभ्यास के लिए 308 वर्ग किमी भूभाग को अधिसूचित क्षेत्र घोषित किया गया था. इसमें 140 वर्ग किमी भूभाग को संघात क्षेत्र निर्धारित किया गया था.
ऐसे क्षेत्र में 1964 से लेकर 1994 तक प्राय: हर साल 22 व 23 मार्च को सेना द्वारा तोप अभ्यास किया गया. तोप अभ्यास के दौरान सेना द्वारा आसपास के सात गांवों को खाली कराया जाता था. यह क्षेत्र आदिवासी बहुल है. फील्ड फायरिंग रेंज के विस्तार के लिए 1991 व 1992 में अधिसूचना जारी की गयी. यह 12 मई 1992 से लेकर 11 मई 2002 तक प्रभावी माना गया. इस अधिसूचना के तहत 1471 वर्ग किमी को अधिसूचित क्षेत्र घोषित किया गया.
इसके अंतर्गत 188 वर्ग किमी संघात क्षेत्र व नेतरहाट में नौ वर्ग किमी और आदर में नौ वर्ग किमी क्षेत्र को सैनिक शिविर बनाने की योजना के बाद अधिसूचना के अनुसार 1471 वर्ग किमी का भूभाग अर्जन किया जाने लगा. जब इसकी जानकारी आदिवासियों को हुई, तो आदिवासी समाज के लोगों ने जन संघर्ष समिति की स्थापना की. इसके बाद जान देंगे व जमीन नहीं देंगे के नारों के साथ आंदोलन शुरू हुआ. तोप अभ्यास से दो लाख 62 हजार 853 लोग विस्थापित हो गये.
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