गोड्डा के जंगलों में आये दिन लग रही है आग, पहाड़ पर बुझाने के नहीं हैं साधन, जानमाल की हो रही क्षति

Updated at : 31 Mar 2025 11:23 PM (IST)
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गोड्डा के जंगलों में आये दिन लग रही है आग, पहाड़ पर बुझाने के नहीं हैं साधन, जानमाल की हो रही क्षति

महुआ चुनने के लिए लगाये गये आग से हर दिन वन विभाग को हो रहा है नुकसान

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सुंदरपहाड़ी के जंगलों में आये दिन आगजनी के मामले हो रहे हैं. हर दिन किसी न किसी जंगल क्षेत्र में आग लग रहा है, जिसका नजारा शाम होते ही देखने को मिल जाता है. विशेषकर पहाड़ों पर जंगल क्षेत्रों में आग पकड़ रहा है. हवा के तेज झोंके के कारण आग तेजी से फैल जाता है. इसका खामियाजा पहाड़िया परिवारों को भुगतना पड़ रहा है. पहाड़िया परिवार के घरों तक आग पहुंच जा रही है. जंगल की आग से ही करमाटांड़ के गम्हारो गांव में आधे दर्जन से अधिक पहाड़िया घरों में आग पकड़ लिया था, जिसमें लाखों की संपत्ति जलकर राख हो गयी थी. हालांकि वन विभाग द्वारा पहाड़िया परिवारों को राहत पहुंचाने का काम भी किया गया था, लेकिन इसके अलावा भी जंगल क्षेत्रों में आये दिन आगजनी की घटना हो रही है.

प्रखंड मुख्यालय सहित क्षेत्र के 10 गांवों में हुई है आगजनी

जानकारी के अनुसार सुंदरपहाड़ी प्रखंड मुख्यालय सहित क्षेत्र के 10 गांवों में आगजनी की घटना हो गयी है, जिसमें वन विभाग के करोड़ों की संपत्ति आग की भेंट चढ़ गयी है. वहीं आग लगने से वन्य प्राणियों को भी क्षति हुई है. वन प्राणी चारो ओर से आग की चपेट में आकर झुलस कर मर रहे हैं. पहाड़ पर आग बुझाने का भी साधन नहीं है, जिसके कारण भारी क्षति उठानी पड रही है. जानकारी के अनुसार अकेले सुंदरपहाड़ी के बैरोगो, जोलो तिलाबाद, कलझोर, पाकतरी, मदनी, जियाजोरी, डाहुबेड़ा, रामपुर, लीलाधोनी, पुसुरकुड़िया, रामपुर, केरासोल, चंदना आदि में है. सबसे घना जंगल सिंदलेर है, जो 10 किलोमीटर के एरिया में फैला हैं. यहां भी आग लगा है. इसके अलावा गोड्डा प्रखंड के जंगल क्षेत्र बुढिकुरा व झिलुवा के साथ ही कुरमन के जंगल में भी आग लगा हुआ है.

दमकल वाहन मौजूद, लेकिन पहाड़ पर बुझाने का काम संभव नहीं

आगजनी की घटना को रोकने के लिए दमकल का एक वाहन सुंदरपहाड़ी प्रखंड मुख्यालय में खड़ा किया गया है, लेकिन पहाड़ पर चढ़ने के साधन के अभाव में किसी काम का नहीं है. दो दिनों पहले चंदना मिशन के समीप आम की बागबानी में आग पकड़ लिया था, जिसको हालांकि दमकल के सहारे बुझाया जा सका. आग लगने के कारण पहाड़ों में तापमान बढ़ा हुआ है. इसका असर पहाड़ पर गुजर-बसर करने वाले पहाड़िया, आदिवासी व वन्य जीवों पर प्रतिकूल रूप से पड़ रहा है.

मार्च व अप्रैल माह में महुआ चुनने के लिये लगायी जाती है आग

आग लगने की सर्वाधिक घटना मार्च व अप्रैल माह में होती है. इन दो महीने में महुआ चुना जाता है. क्योंकि इन दो माह में बडी संख्या में पत्ते व सुखी झाडियां हो जाती है जहां पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे में आग लगा दिया जाता है जिससे कई दिनो तक जंगल में आग पकडा रहता है. सुखे पत्ते व झाडियां तो आग की भेंट चढ जाती हैं लेकिन इसका खामियाजा वन जीवो केा भुगतना होता हैं. दूसरा कारण है कि सुखी झाडियो के कारण मवेशियो के चारे के लिये कुछ नहीं बचता हैं. घास आदि सुखे पत्ते से ढंक जाते हैं. इस लिये भी आगजनी की घटना कर दी जाती है. आग लगने के बाद जंगल में झाडिया समाप्त हो जाती हैं ऐसे में सखुआ के लकडी की भी तस्करी में आसानी होती है.

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