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डोमन साहू ने भाषा व साहित्य को दिलायी पहचान : कौशल किशोर

गंगटा खुर्द में संताली साहित्यकार डॉ डोमन साहू व समीर की 100वीं जयंती मनी, नाजीर, धनंजय हेंब्रम, शिवलाल मराडी व शिबू किस्कू हुए सम्मानित

गोड्डा. संताली साहित्य के महान साहित्यकार सह दर्जनों किताब लिखने वाले डॉ डोमन साहू, समीर की 100वीं जयंती पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया. गंगटा खुर्द के सोरेन बगान परिसर में आयोजित जन्म शताब्दी कार्यक्रम का आयोजन संताली साहित्य सह कला परिषद गोड्डा की ओर से आयोजित किया गया. शुभारंभ झारखंड के विभिन्न शहर व ओड़िशा से आये संताली साहित्य के विद्वानों ने दीप जलाकर किया. सिदो-कान्हू , पंडित रघुनाथ मुर्मू व डोमन साहू व समीर की तस्वीर पर की तस्वीर पर माल्यार्पण किया. समारोह में कौशल किशोर, माेहनचंद्र बास्की, गौरव दीनबंधु गुप्ता, चूंडा सोरेन, सिपाही, बाबूजी सोरेन, वीरवाहा, नपाय किस्कू, सुभाष मरांडी के साथ संताल आदिवासी कला साहित्य सह परिषद के अध्यक्ष सोनोती हांसदा, उपाध्यक्ष प्रधान बेसरा, सलाहकार सुहागिनी हेंब्रम, को-ऑर्डिनेटर मनचन हांसदा, मांझापी व संरक्षक ईश्वरचंद्र हेंब्रम मौजूद थे. अतिथियों का स्वागत बैज लगाकर एवं शॉल ओढ़ाकर किया गया. कार्यक्रम दो चरणों में पूरा किया गया. पहले चरण में अभिभाषण व पुस्तक विमोचन व दूसरे चरण में साहित्य पर चर्चा की गयी. मंच संचालन को-ऑर्डिनेटर मनचन हांसदा ने किया. मुख्य अतिथि सह डोमन साहू के पोता कौशल किशोर ने कहा कि डॉ डोमन साहू समीर साहित्य जगत के झिलमिलाते सितारे की तरह थे. संताली साहित्य पर अपनी पूरी जीवन समर्पित करने का काम किया. हालांकि हिंदी व संस्कृत साहित्य में पकड़ की वजह से उन्होंने किताब लिखने का काम किया. गोड्डा के सदर प्रखंड के पनदाहा मखनी गांव के रहनेवाले डोमन साहू ने संताली साहित्य को आगे बढ़ाया. उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. लोंगगाडा पत्रिका, संपादक मोहन चंद्र बास्की ने कहा कि डॉ डोमन साहू “समीर ” संताल नहीं थे ,बावजूद उनकी संताली साहित्य में काफी योगदान रहा. संताली साहित्य के लिए गर्व की बात है.उनका जन्म 30 जून को हुआ था मगर हूल दिवस की वजह से एक दिन पूर्व उनका 100वॉ शताब्दी जयंती समारोह मनाया गया. इस दौरान नाती गौरव दिनबंधु कुमार ने कहा कि उनके लिए सबसे खुशी की बात है कि जो काम डोमन साहू ने किया है , अब तक किसी ने नहीं किया. क्रम में संताली पत्र के संपादक चुंडा सोरेन,सिपाही ने आने संबोधन में कहा कि साहित्य समासज के लोगों के सोच व विचार व समाज पर निर्भर करता है. साहित्य समाज का दर्पण है. डॉ. डोमन साहू “समीर ” कहा करते थे की संताली भाषा संस्कृत से आया है. क्योंकि वे तुलनात्मक लेखक भी थे. स्वागत गीत व बांसुरी की धुन पर कलाकारों ने बांधा समा जयंती शताब्दी समारोह दौरान स्थानीय बालिकाओं ने अतिथियों के स्वागत में संताली गीत गाकर किया. साहित्यकार शिवलाल मरांडी की बासुंरी की धुन व सुरेंद्र मुर्मू के हारमोनियम, अनिल हांसदा के मांदर के साथ ताला बाबू हेंब्रम ने नगाड़े पर संगत ने लोगों को जोरदार मनोरंजन किया. कार्यक्रम के दौरान ऑलचिकी भाषा को आगे बढ़ाने व उसपर काम करने वाले संताली साहित्यकारों में शामिल शिवलाल मरांडी, बेचारा को डॉ डोमन साहू स्मृति सम्मान से नवाजा गया. श्री बेचारा के साथ दुमका के धनंजय हेंब्रम, पाकुड़ के शिबू टूडू को भी सम्मानित किया गया. मौके पर साहित्यकार शिवकुमार भगत, भरत हांसदा, भैया हांसदा, शुभम जयश्री मुर्मू, राजचंपा, श्याम बेसरा, शिकार किस्कू, निशि किस्कू, लेबेंडर सोरेन आदि मौजूद थे. इस दौरान अतिथियों ने दो पुस्तक का विमोचन किया. इनमें से साहेबगंज के साहित्यकार सह ऑल इंडिया संताली लेखक संघ के सचिव सह शिक्षक सुशील कुमार मरांडी की पुस्तक, दुलाड़ दारहा यानि प्यार का भंवर का एवं संताली साहित्य अकादमी दिल्ली के एडवाजरी बोर्ड सदस्य नाजीर सोरेन की पुस्तक साँवहेंत् साकवा का विमोचन के साथ सेवोनियर का विमोचन किया गया.

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