Giridih News : कुमार गौरव, बगोदर. नाइजर में फंसे बगोदर प्रखंड के दोंदलों के चार प्रवासी मजदूर और मुंडरो के एक मजदूर सकुशल घर लौट आये हैं. सभी के घरों में मकर सक्रांति पर्व की खुशियां दोगुणी हो गयी है. दोंदलो के प्रवासी मजदूर राजू महतो और फलजीत महतो के घर में पूजा-पाठ होने के बाद सभी के चेहरे पर खुशी देखने को मिल रही है. इन सबके बीच प्रभात खबर के प्रतिनिधि मजदूर फलजीत महतो के पहले घर पहुंचे तो देखा कि घर में फलजीत की पत्नी पूजा -पाठ कर रही हैं. आठ माह के बाद अपने पति को सुरक्षित देखकर भगवान से हाथ जोड़ विनती कर रही हैं.
पति की कुशलता के लिए हर रोज भगवान के समक्ष टेकती थी मत्था : रूपा
फलजीत की पत्नी रूपा देवी बताती हैं कि हर दिन अपने पति की कुशलता और जल्दी घर लौट आने के लिए भगवान से प्रार्थना करती रहती थीं. बेटा संदीप कुमार और नुनूचंद कुमार भी अपने पिता से बात करने के लिए तरस गये थे. पहले जब वह काम करते थे तो हर तीन-चार दिन में एक बार उनसे वीडियो कॉल पर बात हो जाती थी. इससे पता चलता था कि पति काम पर गये हैं और शाम में हाल समाचार भी लिया जाता था, लेकिन आठ माह के दौरान उनसे किसी भी तरह का संपर्क नहीं हो रहा था, जिससे सब दुखी थे. कहा कि रोजी-रोटी के लिए बाहर तो जाना मजबूरी है.देश वापस जा पायेंगे या नहीं, यह सोचकर परेशान थे : फलजीत
फलजीत महतो ने भी आतंकियों द्वारा कब्जा किए जाने की पूरी कहानी बताते हुए कहा कि डर के माहौल और काफी परेशानी में हम लोगों ने आठ माह गुजारे. चारों तरफ जंगल था और सभी आतंकी हथियार से लैस रहते थे. दूर-दूर तक सिर्फ बड़े-बड़े पेड़ देखने को मिलते थे. हम 50 मीटर के दायरे में ही रहने को विवश थे. हालांकि हम लोगों को खाने-पीने की सुविधा दी गयी थी. जो राशन-पानी हम लोग को मिलता था, उसी को हम लोग बनाकर खाते थे. अधिकांश में हम लोग माड़-भात ही खाना पसंद करते थे. कभी-कभार सब्जी वगैरह भी खा लेते थे. पूरे आठ माह तक जंगल में हम लोग डर के साये रहे. वहीं हम लोगों को कैद में लेने की वजह नहीं बताया जाता था. सिर्फ यह आश्वासन दिया जाता था कि छह-आठ माह या एक-दो साल में रिहा कर दिया जायेगा, जिससे मन में बेचैनी बढ़ जाती थी. लेकिन सरकार के दबाव के बाद हम लोगों की वतन वापसी हो गयी. कहा कि अब नाइजर नहीं जायेंगे. दूसरे देश में रोजगार के लिए जाना मजबूरी है. फलजीत के माता-पिता घर में नहीं थे. वे गाय-बकरी चराने के लिए जंगल की ओर गये हुए थे.सोशल मीडिया पर राजू की रिहाई की सूचना पाकर गदगद हुए चाचा
इधर, मजदूर राजू महतो के घर में खुशी का माहौल है. घर में उसकी चाची बुधनी देवी, चाचा डेगलाल महतो भी पहुंचे हुए थे. भतीजा राजू के घर आने की खुशी में चाचा-चाची के चेहरे पर खुशी देखने को मिल रही थी. चाचा डेगलाल महतो ने बताया कि सोशल मीडिया पर ही देखा कि भतीजा मुंबई पहुंच गया है. सूचना मिलने के बाद मन गदगद हो गया. कहा कि भतीजे की सकुशल रिहाई को लेकर हम लोग कोडरमा में जाकर आंदोलन भी किये थे. चाची बुधनी बताती हैं कि जब सुने की राजू घर आया है, दूसरे दिन ही मिलने आ गये. राजू को सकुशल देख कर हमें बहुत खुशी है.बेटे के घर पहुंचने पर मां कमली देवी के चेहरे पर दिखी खुशी
दूसरी ओर आठ माह 11 दिन के बाद अपने बेटे राजू को देख मां कमली देवी खुशी में भावुक हो गयीं. कमली देवी बताती हैं कि आठ महीने गांव में हर किसी से बेटे के आने की सूचना के लिए तरसती रहीं. उन्होंने बताया कि पूरे आठ माह तक टेंशन में थे. कोई काम में मन नहीं लगता था. करमा, दुर्गापूजा, दीपावली जैसा परब कब गुजर गये, पता ही नहीं चला. हर दिन मैं बाहर निकल कर राह तकती थी कि कब बेटा घर के दरवाजे पर आयेगा. कहा कि बेटा सात-आठ महीने बढ़िया से घर में नहीं रह ले. उसके बाद उसे कमाने के लिए जहां जाना होगा जायेगा, लेकिन वह अब विदेश नहीं जायेगा. उन्होंने यह भी बताया कि बेटा देश में रहकर भी पैसा कमा सकता है. अब विदेश जाने की जरूरत नहीं है.अब अपने पति को नाइजर नहीं भेजेंगे : लक्ष्मी
राजू महतो के घर में खुशी का माहौल है. वहीं बच्चे भी खुश हैं और पत्नी के चेहरे पर भी खुशी देखने को मिल रही है. पत्नी लक्ष्मी देवी का कहना है कि सभी का शुक्रगुजार हूं, जो हमारे पति आतंकवादियों के कब्जे से छुड़वा दिया गया है. रोजी रोजगार के लिए तो बाहर जाना पड़ेगा ही, लेकिन अब नाइजर नहीं भेजेंगे.घने जंगल और चारों तरफ था बालू का ढेर, डर के साये में काटते थे रात : राजू
इधर, अपने घर लौटे राजू महतो ने भी आठ माह के दौरान आतंकियों के चंगुल में फंसे रहने की पूरी दस्तान सुनायी. राजू ने कहा कि वहां चारों तरफ घना जंगल था. दूर-दूर तक रेत-ही-रेत दिखाई देता था. हम लोग जो कपड़े भी पहने हुए थे, उसे उतरवाकर खलीता और पजामा पहना दिया गया था. साथ ही हमलोगों को दाढ़ी कटवाने की मनाही थी. दाढ़ी पूरी तरह से बढ़ी रहती थी. एक दायरे में ही हम लोगों रहना पड़ता था. बाथरूम आदि भी अगर जाना है तो एक दायरा बंधा हुआ था. हालांकि हम लोोंग को खाने-पीने की कोई समस्या नहीं थी. फिर भी परिवार से संपर्क नहीं होने से मन में डर रहता था. यह भी डर बना हुआ रहता था कि कहीं आतंकी हम लोगों को मार ना दें. सबसे बड़ी समस्या हम लोगों को भाषा की होती थी. हम लोग हिंदी बोलते थे, जबकि आतंकी लोग न हिंदी बोलते थे और ना ही अंग्रेजी. हमें सिर्फ खाने-पीने का सामान दे दिया जाता था. रात में हम लोग जब भी बाहर देखते थे तो आंतकियों को जगा हुआ पाते थे. यूं भी हम लोगों को बेचैनी से रात भर नींद नहीं आती थी. क्योंकि चारों तरफ से रिवाल्वर और बड़ा-बड़ा हथियार के साथ आतंकी हम लोगों को बंधक बनाकर रखते थे. वे लोग अरेबियन भाषा में बात करते थे, जिसे हम समझ नहीं पाते थे. हम लोग परिवार से भी संपर्क के लिए उनसे हाथ-जोड़ विनती भी किये, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. जहां हमें रखा गया था, वहां चारों तरफ जंगल था. बारिश होती थी तो भी हम लोगों को एक तिरपाल दिया जाता था, जिसे लपेटकर बारिश से भीगने से बचते थे. राजू महतो ने यह भी बताया कि अब विदेश जाने का इरादा नहीं है, कंपनी से बात हुई है. कंपनी ने यह आश्वस्त किया है कि भारत में ही कहीं पर काम दिया जायेगा. हम लोगों ने जो आठ महीने डर के साये में गुजारे हैं, वैसी नौबत किसी के साथ न आये.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

