गढ़वा विधायक को राहत नहीं: अलकतरा घोटाला केस में आरोप तय, जानें अब आगे क्या
Published by : Sameer Oraon Updated At : 12 Feb 2026 5:50 PM
सत्येंद्रनाथ तिवारी की फाइल फोटो, Pic Credit- X Handle
Satyendranath Tiwari: अलकतरा घोटाला मामले में गढ़वा के भाजपा विधायक सत्येंद्रनाथ तिवारी पर सीबीआई कोर्ट में आरोप तय हो चुका है. सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने के बाद अब 20 फरवरी से शुरू होगी गवाही.
Satyendranath Tiwari, रांची : अलकतरा घोटाला मामले में सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश योगेश कुमार की अदालत में गढ़वा के भाजपा विधायक सत्येंद्रनाथ तिवारी पर चार्जफ्रेम (आरोप गठन) किया गया. मामले में विधायक अदालत में सशरीर उपस्थित हुए. अब मामले में 20 फरवरी से गवाही शुरू होगी. कोर्ट ने सीबीआइ को गवाह पेश करने का आदेश दिया है. मामले में सीबीआई के लोक अभियोजक खुशबू जायसवाल ने बहस की.
विधायक सत्येंद्र तिवारी की याचिका खारिज हो चुकी है सुप्रीम कोर्ट में
बताया जाता है कि मामले में विधायक सत्येंद्र तिवारी ने स्टे लगवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट उनकी याचिका को खारिज कर चुकी है. इधर विधायक श्री तिवारी कुछ दिन पहले हाइकोर्ट भी गये थे. मामले में दो फरवरी को सुनवाई थी, इसलिए अदालत ने चार्जफ्रेम की तिथि छह फरवरी को तय की थी. छह फरवरी को कोर्ट में हड़ताल के कारण तिथि आगे बढ़ा कर 11 फरवरी कर दी गयी थी.
सीबीआइ ने 2009 में दर्ज की थी प्राथमिकी
सीबीआइ ने वर्ष 2009 में प्राथमिकी दर्ज कर अलकतरा घोटाले मामले की जांच शुरू की थी. विधायक सत्येंद्रनाथ तिवारी पर आरोप है कि उन्होंने कलावती कंस्ट्रक्शन के नाम से छत्तरपुर-जपला रोड (32 किमी) बनाने का ठेका लिया था. योजना की लागत करीब सात करोड़ रुपये थी. निर्माण कार्य के दौरान उन्होंने कथित तौर पर 61 फर्जी बिल के माध्यम से 1200 मीट्रिक टन अलकतरा की सप्लाई दिखाकर लगभग 2.24 करोड़ रुपये की अवैध निकासी की थी. इसी मामले में विधायक साल 2012 में जेल भी जा चुके हैं.
अब आगे क्या
कानूनी प्रक्रिया के तहत, अब जब सत्येंद्रनाथ तिवारी का आरोप गठन हो चुका है और सुप्रीम कोर्ट से भी किसी तरह की राहत नहीं मिली है, तो मामला नियमित ट्रायल के रास्ते आगे बढ़ेगा. गवाही के दौरान यदि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों के माध्यम से साबित करने में सफल रहता है, तो अदालत अभियुक्त विधायक के विरुद्ध दोष सिद्ध कर सकती है. वहीं, यदि बचाव पक्ष गवाहों की जिरह के माध्यम से अभियोजन के साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास या कमी साबित कर देता है, तो अभियुक्त को संदेह का लाभ भी मिल सकता है. ट्रायल पूरा होने के बाद अदालत अंतिम बहस सुनेगी और उसके बाद फैसला सुरक्षित या सुनाया जाएगा, जिसके बाद दोष सिद्ध होने की स्थिति में सजा तय की जाएगी. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के तहत विधायक की सदस्यता पर भी प्रभाव पड़ सकता है.
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समीर उरांव, डिजिटल मीडिया में सीनियर जर्नलिस्ट हैं और वर्तमान में प्रभात खबर.कॉम में सीनियर कटेंट राइटर के पद पर हैं. झारखंड, लाइफ स्टाइल और स्पोर्ट्स जगत की खबरों के अनुभवी लेखक समीर को न्यूज वर्ल्ड में 5 साल से ज्यादा का वर्क एक्सपीरियंस है. वह खबरों की नब्ज पकड़कर आसान शब्दों में रीडर्स तक पहुंचाना बखूबी जानते हैं. साल 2019 में बतौर भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता करने के बाद उन्होंने हिंदी खबर चैनल में बतौर इंटर्न अपना करियर शुरू किया. इसके बाद समीर ने डेली हंट से होते हुए प्रभात खबर जा पहुंचे. जहां उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग और वैल्यू ऐडेड आर्टिकल्स लिखे, जो रीडर्स के लिए उपयोगी है. कई साल के अनुभव से समीर पाठकों की जिज्ञासाओं का ध्यान रखते हुए SEO-ऑप्टिमाइज्ड, डेटा ड्रिवन और मल्टीपल एंगल्स पर रीडर्स फर्स्ट अप्रोच राइटिंग कर रहे हैं.
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