गढ़वा विधायक को राहत नहीं: अलकतरा घोटाला केस में आरोप तय, जानें अब आगे क्या

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सत्येंद्रनाथ तिवारी की फाइल फोटो, Pic Credit- X Handle

Satyendranath Tiwari: अलकतरा घोटाला मामले में गढ़वा के भाजपा विधायक सत्येंद्रनाथ तिवारी पर सीबीआई कोर्ट में आरोप तय हो चुका है. सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने के बाद अब 20 फरवरी से शुरू होगी गवाही.

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Satyendranath Tiwari, रांची : अलकतरा घोटाला मामले में सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश योगेश कुमार की अदालत में गढ़वा के भाजपा विधायक सत्येंद्रनाथ तिवारी पर चार्जफ्रेम (आरोप गठन) किया गया. मामले में विधायक अदालत में सशरीर उपस्थित हुए. अब मामले में 20 फरवरी से गवाही शुरू होगी. कोर्ट ने सीबीआइ को गवाह पेश करने का आदेश दिया है. मामले में सीबीआई के लोक अभियोजक खुशबू जायसवाल ने बहस की.

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विधायक सत्येंद्र तिवारी की याचिका खारिज हो चुकी है सुप्रीम कोर्ट में

बताया जाता है कि मामले में विधायक सत्येंद्र तिवारी ने स्टे लगवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट उनकी याचिका को खारिज कर चुकी है. इधर विधायक श्री तिवारी कुछ दिन पहले हाइकोर्ट भी गये थे. मामले में दो फरवरी को सुनवाई थी, इसलिए अदालत ने चार्जफ्रेम की तिथि छह फरवरी को तय की थी. छह फरवरी को कोर्ट में हड़ताल के कारण तिथि आगे बढ़ा कर 11 फरवरी कर दी गयी थी.

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सीबीआइ ने 2009 में दर्ज की थी प्राथमिकी

सीबीआइ ने वर्ष 2009 में प्राथमिकी दर्ज कर अलकतरा घोटाले मामले की जांच शुरू की थी. विधायक सत्येंद्रनाथ तिवारी पर आरोप है कि उन्होंने कलावती कंस्ट्रक्शन के नाम से छत्तरपुर-जपला रोड (32 किमी) बनाने का ठेका लिया था. योजना की लागत करीब सात करोड़ रुपये थी. निर्माण कार्य के दौरान उन्होंने कथित तौर पर 61 फर्जी बिल के माध्यम से 1200 मीट्रिक टन अलकतरा की सप्लाई दिखाकर लगभग 2.24 करोड़ रुपये की अवैध निकासी की थी. इसी मामले में विधायक साल 2012 में जेल भी जा चुके हैं.

अब आगे क्या

कानूनी प्रक्रिया के तहत, अब जब सत्येंद्रनाथ तिवारी का आरोप गठन हो चुका है और सुप्रीम कोर्ट से भी किसी तरह की राहत नहीं मिली है, तो मामला नियमित ट्रायल के रास्ते आगे बढ़ेगा. गवाही के दौरान यदि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों के माध्यम से साबित करने में सफल रहता है, तो अदालत अभियुक्त विधायक के विरुद्ध दोष सिद्ध कर सकती है. वहीं, यदि बचाव पक्ष गवाहों की जिरह के माध्यम से अभियोजन के साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास या कमी साबित कर देता है, तो अभियुक्त को संदेह का लाभ भी मिल सकता है. ट्रायल पूरा होने के बाद अदालत अंतिम बहस सुनेगी और उसके बाद फैसला सुरक्षित या सुनाया जाएगा, जिसके बाद दोष सिद्ध होने की स्थिति में सजा तय की जाएगी. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के तहत विधायक की सदस्यता पर भी प्रभाव पड़ सकता है.

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