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'कॉफी विद एसडीएम' में गढ़वा के मूर्तिकारों से संवाद, मिट्टी के कलाकारों के लिए जल्द लगेगा मृदा शिल्प मेला

Updated at : 10 Sep 2025 9:31 PM (IST)
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Sculptors in Coffee With SDM

मूर्तिकारों के साथ एसडीएम संजय कुमार

Coffee With SDM: गढ़वा में आज बुधवार को कॉफी विद एसडीएम कार्यक्रम का आयोजन किया गया. एसडीएम संजय कुमार ने मिट्टी की मूर्तियां बनाने वाले मूर्तिकारों से संवाद किया. उन्होंने मूर्तिकारों को आश्वस्त किया कि उनके कौशल विकास एवं प्रशिक्षण के लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे. जल्द ही गढ़वा में मिट्टी के कलाकारों के लिए एक भव्य 'मृदा शिल्प मेला ' का आयोजन किया जाएगा. इससे उन्हें अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने और बाजार से सीधे जुड़ने का अवसर मिलेगा.

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Coffee With SDM: गढ़वा-आज बुधवार को सदर एसडीएम संजय कुमार ने अपने नियमित साप्ताहिक कार्यक्रम कॉफी विद एसडीएम में मिट्टी की मूर्तियां बनाने वाले मूर्तिकारों के साथ संवाद किया. इस अवसर पर अनेक मूर्तिकार उपस्थित हुए. उन्होंने अपनी समस्याओं एवं सुझावों को साझा किया. मूर्तिकारों ने मिट्टी की सहज उपलब्धता, बाजार तक पहुंच तथा उनके कार्य को प्रोत्साहन देने के लिए मेलों के आयोजन जैसी मांगें रखीं. एसडीएम संजय कुमार ने मूर्तिकारों को आश्वस्त किया कि उनके कौशल विकास एवं प्रशिक्षण के लिए प्रशासन द्वारा हर संभव प्रयास किए जाएंगे. उन्होंने भरोसा दिलाया कि शीघ्र ही गढ़वा में विशेष रूप से मिट्टी के कलाकारों के लिए एक भव्य ‘मृदा शिल्प मेला ‘ आयोजित किया जाएगा. इससे उन्हें अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने और बाजार से सीधे जुड़ने का अवसर मिलेगा.

कला, संस्कृति, धर्म और परंपराओं के वाहक हैं शिल्पकार


गढ़वा एसडीएम ने कहा कि सभी शिल्पकार न केवल कला के संरक्षक हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, धर्म और परंपरा के वाहक भी हैं. प्रशासन उनके विकास और हर सुख-दु:ख में उनके साथ खड़ा है. उन्होंने कहा कि कलाकारों पर ईश्वर की विशेष कृपा होती है इसलिए उनकी विद्या के कारण वे सभी आदर के पात्र हैं.

कोयल नदी की मिट्टी मूर्ति निर्माण अनुकूल


ज्यादातर मूर्तिकारों ने कहा कि गढ़वा में कोयल नदी के तटीय इलाकों की मिट्टी मूर्ति निर्माण के लिए बहुत ही अनुकूल है. यहां पुआल की भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता है. इतना ही नहीं यहां के लोगों में सीखने की प्रवृत्ति भी है. इसलिए गढ़वा में मूर्ति कला के क्षेत्र में थोड़ा सा प्रयास किए जाने पर भी बहुत अच्छा परिणाम लाया जा सकता है.

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इको-फ्रेंडली होती हैं मिट्टी की मूर्तियां


मूल रूप से बंगाल के रहने वाले, लेकिन गढ़वा को ही अपनी कर्म स्थली मानने वाले राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कृत मूर्तिकार संजय सूत्रधार ने बताया कि मिट्टी और पुआल से बनी मूर्तियां पूरी तरह से जलाशयों में विसर्जन करने योग्य होती हैं. उनसे किसी भी प्रकार का जल प्रदूषण नहीं होता है. किंतु चाइनीज सामग्री तथा प्लास्टर ऑफ पेरिस और खतरनाक रंगों से बनी मूर्तियां जल प्रदूषण के दृष्टिकोण से हानिकारक हैं. उन्होंने कहा कि यदि मूर्तिकारों को अच्छा माहौल मिले तो गढ़वा में पर्यावरण अनुकूल मिट्टी की मूर्तियों के व्यवसाय का बहुत स्कोप है.

छोटी मूर्तियों के लिए स्थानीय स्तर पर बाजार की कमी


कांडी प्रखंड के रहने वाले देवेंद्र प्रजापति और सदर प्रखंड के उदय प्रजापति ने कहा कि त्योहारों के दौरान बड़ी मूर्तियों को बनाने वाले लोगों को बाजार मिल जाता है, किंतु छोटी मूर्तियों, खिलौनों आदि के लिए गढ़वा में बाजार अनुकूल नहीं है. यदि प्रशासनिक स्तर से ब्रांडिंग और बाजार उपलब्धता में मदद मिल जाए तो यहां के स्थानीय मूर्तिकार सालों पर मिट्टी की कला से अपनी बेहतर जीविका चला सकते हैं.

मिट्टी की उपलब्धता की मांग


हरिहरपुर निवासी विनोद प्रजापति एवं कुछ अन्य मूर्तिकारों ने एसडीएम के साथ संवाद के दौरान समस्या रखी कि जब भी वे लोग नदी किनारे से मिट्टी उठाने जाते हैं तो स्थानीय लोग उनको मना करते हैं. बेहतर हो यदि नदी तटीय इलाकों में हर प्रखंड में मूर्तिकारों के लिए कुछ इलाका चिन्हित कर दिया जाए तो वे लोग वहां से मिट्टी उठा सकेंगे. ऐसा हो जाने पर वे निर्बाध तरीके से अपना काम कर पाएंगे. इस पर अनुमंडल पदाधिकारी ने उन लोगों से ऐसे स्थान का सुझाव मांगा, जहां उनके लिए मिट्टी उठाने की अनुमति दी जा सके.

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मूर्तिकारों को मिले प्रशिक्षण


गढ़वा के तेनार गांव निवासी दिव्यांग शिल्पकार संतोष कुमार प्रजापति ने मांग रखी कि प्रशासनिक स्तर से गढ़वा के शिल्पकारों को अत्याधुनिक तौरतरीकों से अवगत कराते हुए प्रशिक्षण दिलवाया जाए, साथ ही उन्हें विश्वकर्मा योजना के तहत या किसी अन्य कल्याणकारी योजना के तहत उपकरण आदि में मदद दी जाए. उन्होंने बताया कि वे फिलहाल जाटा गांव से मिट्टी लेकर आते हैं लेकिन उन्हें हर बार मिट्टी के लिए 1500 रुपए का भुगतान करना पड़ता है.

सम्मानजनक जीविका है मूर्ति कला


शिल्प कला को ही अपना मूल व्यवसाय मानने वाले शिबू कुमार कहते हैं कि एक समय था जब उनके लिए 2 जून की रोटी भी मुश्किल थी किंतु वे मिट्टी की इस विधा से जुड़कर हर महीने 15 से 20 हजार रुपए महीना कमा रहे हैं. इसलिए जो युवा इस दिशा में प्रशिक्षण लेकर इसे व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहते हैं उनके लिए न केवल नाम और ख्याति हासिल करने का काम है बल्कि जीविका चलाने के लिए भी यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है.

अखबारी कागज और रद्दी आइटम से भी बनाते हैं कलाकृतियां


संजय सूत्रधार, शिबू कुमार, देवेंद्र आदि ने बताया कि वे पुराने अखबारों एवं रद्दी कागजों को भिगोकर उससे बनी लुगदी और मिट्टी मिलाकर भी मूर्तियां बनाते हैं, इतना ही नहीं अंडे की पुरानी ट्रे और ऐसे ही गत्ते आदि की लुगदी बनाकर भी खूबसूरत मूर्तियां, मुखौटे, खिलौने आदि बनाते हैं और अच्छी बात यह है कि उक्त सभी कलाकृतियां इको फ्रेंडली होती हैं ये आसानी से पानी में गल जाती हैं.

शिल्प मेला का आयोजन जल्द


संजय कुमार ने मूर्तिकारों की मांग पर कहा कि वे मिट्टी से जुड़े कलाकारों को मंच और पहचान देने के लिए तीन दिवसीय मृदा शिल्प मेला मुख्यालय स्तर पर आयोजित करने की कोशिश करेंगे. यदि सब कुछ ठीक रहा तो उकू मेला दिवाली के आसपास आयोजित किया जाएगा. कार्यक्रम के अंत में अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार ने सभी शिल्पकारों को अंगवस्त्र ओढ़ाकर सम्मानित किया तथा उनकी कला के उत्तरोत्तर विकास के लिए शुभकामनाएं दीं.

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Guru Swarup Mishra

लेखक के बारे में

By Guru Swarup Mishra

मैं गुरुस्वरूप मिश्रा. फिलवक्त डिजिटल मीडिया में कार्यरत. वर्ष 2008 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पत्रकारिता की शुरुआत. आकाशवाणी रांची में आकस्मिक समाचार वाचक रहा. प्रिंट मीडिया (हिन्दुस्तान और पंचायतनामा) में फील्ड रिपोर्टिंग की. दैनिक भास्कर के लिए फ्रीलांसिंग. पत्रकारिता में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए. 2020 और 2022 में लाडली मीडिया अवार्ड.

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