सूर्य उपासना के लिए श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं नदी तट

Updated at : 26 Oct 2017 11:21 AM (IST)
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सूर्य उपासना के लिए श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं नदी तट

गढ़वा: छठ पूजा करनेवाले श्रद्धालुओं के लिए गढ़वा जिला की प्राकृतिक एवं भौगोलिक दोनों ही दृष्टिकोण से अनुकूल है. इसीलिए यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु हर साल कार्तिक छठ करते हैं. न सिर्फ गढ़वा जिले के बल्कि आसपास के राज्यों से भी श्रद्धालु छठ करने के लिए यहां आते हैं. श्रद्धालुओं के लिए यहां […]

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गढ़वा: छठ पूजा करनेवाले श्रद्धालुओं के लिए गढ़वा जिला की प्राकृतिक एवं भौगोलिक दोनों ही दृष्टिकोण से अनुकूल है. इसीलिए यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु हर साल कार्तिक छठ करते हैं. न सिर्फ गढ़वा जिले के बल्कि आसपास के राज्यों से भी श्रद्धालु छठ करने के लिए यहां आते हैं. श्रद्धालुओं के लिए यहां भले ही गंगा का तट नहीं है, लेकिन सोन, कोयल जैसी नदियों का विशाल तट सूर्य की उपासना के लिए काफी उपयुक्त हैं. यहां हर डेग पर बड़ी-छोटी नदियां मिलती हैं.
इसलिए गढ़वा जिला को नदियों का पर्याय कहा जाय, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. यहां सोन, कोयल ही नहीं, बल्कि पंडा, कनहर, तहले, बांकी, दानरो, सरस्वतिया, फूलवरिया, खजुरिया, लौंगा, उरिया जैसी दर्जनों नदियां बहती हैं. ये नदियां बरसाती होने के बावजूद कम से कम कार्तिक छठ के दौरान उसमें इतना पानी रहता है कि उसके तट पर बैठकर छठ किया जा सके. चार दिवसीय छठ पूजा के दौरान षष्ठी तिथि को रात भर जगकर सूर्य उपासना करने का महत्व है. आध्यात्मिकता के दृष्टिकोण से यह उपासना नदी तट पर करने पर श्रद्धालु को पूरा लाभ मिलता है, क्योंकि यहां शांत, एकांत एवं नदी के प्रवाह के पास बैठकर उपासना करने से वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी व्रतधारी पर वातावरण का प्रभाव पड़ता है.

यहां नदी में स्नान कर षष्ठी तिथि की संध्या को अस्ताचलगामी और दूसरे दिन सुबह में उदीयमान भगवान भाष्कर को अर्ध्य दिया जाता है. इन तटों पर गूंज रहे छठ के सुहाने गीत सुहाने वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं. कई छठघाट तो ऐसे हैं कि वहां कब से छठ पूजा करने की शुरूआत हुई है, यह कोई भी बताने की स्थिति में नहीं है. गढ़वा जिले के बांकी नदी तट पर स्थित नगरउंटारी का सूर्य मंदिर छठ व्रत करने के लिये विख्यात है, जहां झारखंड सहित यूपी, बिहार, छतीसगढ़ आदि पड़ोसी राज्य से हजारों की संख्या में श्रद्धालु सूर्य की उपासना करने के लिये परिवार सहित आते हैं. इसके अलावे केतार प्रखंड का नारायण वन, पंडा नदी का घाट, कांडी एवं भवनाथपुर से जुड़ा सोन नदी का विशाल तट, मझिआंव प्रखंड का कोयल नदी का तट जैसे स्थल पर हजारों श्रद्धालु छठ करते आ रहे हैं. इधर बीते कुछ साल से सतबहिनी झरना स्थल को विकसित करने के बाद वहां जब से सूर्य मंदिर की स्थापना की गयी है, काफी दूर-दराज से हजारों की संख्या में लोग पहुंचकर छठ करते आ रहे हैं.

इसी तरह दानरो एवं सरस्वतिया के संगम स्थल पर स्थित गढ़वा शहर भी छठ व्रत के लिये बीते दो दशक से विख्यात हो गया है. यहां दानरो नदी की सीमा भले ही छोटी हो, लेकिन यहां के समर्पित स्वयंसेवी संगठनों के प्रयास से गढ़वा शहर के अंदर नदी तट के दोनों तटों पर कम से कम 10 हजार श्रद्धालु सीमा के अंदर स्थित दोनों तटों पर बैठकर छठव्रत करते हैं. यह संख्या हर साल बढ़ते ही जा रहा है. इसके अलावे अन्य छोटी नदियों, तालाबों एवं डैमों पर भी लोग छठ करते हैं.

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