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आधुनिकता की मार, फिर भी टिकी है परंपरा, मकर-टुसू पर्व पर मिट्टी के बर्तनों की मांग कायम

Updated at : 09 Jan 2026 10:18 PM (IST)
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Makar Tusu Festival

मिट्टी का बर्तन तैयार करते कुम्हार, Pic Credit- Prabhat Khabar

Makar Tusu Festival: मकर और वार्षिक टुसू पर्व को लेकर पूर्वी सिंहभूम के पटमदा और बोड़ाम क्षेत्र में कुम्हार परिवार दिन-रात मिट्टी के बर्तन बनाने में जुटे हैं. बढ़ती महंगाई और आधुनिकता की चुनौतियों के बावजूद पर्व और पूजा-पाठ में मिट्टी के बर्तनों की मांग आज भी बनी हुई है.

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Makar Tusu Festival, पूर्वी सिंहभूम: मकर और वार्षिक टुसू पर्व को लेकर पूर्वी सिंहभूम जिले के पटमदा और बोड़ाम प्रखंड के लावा, गोपालपुर, जोड़सा, सुसनी, कुईयानी सहित कई गांवों में कुम्हार जाति के परिवार दिन-रात मेहनत में जुटे हुए हैं. वे पर्व के मद्देनजर परंपरागत मिट्टी के बर्तन तैयार किए जा रहे हैं, ताकि समय पर स्थानीय हाट-बाजारों में इन्हें बेचकर कुछ आमदनी प्राप्त की जा सके. पश्चिम बंगाल सीमा से सटे पटमदा क्षेत्र के जोड़सा, बिरखाम, गोपालपुर, लावा, सुसनी, कुईयानी और रूपसान गांवों में बड़ी संख्या में कुम्हार परिवार अस्थायी रूप से निवास करते हैं और इसी समय उनका साल का सबसे व्यस्त दौर रहता है.

बदलते समय के साथ कुम्हारों का यह धंधा चुनौतीपूर्ण

बढ़ती महंगाई और बदलते समय के साथ कुम्हारों का यह पुश्तैनी धंधा लगातार चुनौतियों से जूझ रहा है. अधिकांश परिवार आजीविका के लिए पारंपरिक पेशे को छोड़कर मजदूरी, नौकरी और अन्य व्यवसायों से जुड़ चुके हैं. हालांकि, अब भी कुछ परिवार ऐसे हैं, जो परंपरा को जीवित रखने के लिए मिट्टी के बर्तन बनाने का काम कर रहे हैं. जोड़सा गांव के अरुण कुंभकार, श्रावण कुंभकार और दोल गोविंद कुंभकार बताते हैं कि वे अपने हाथों से तैयार किए गए बर्तनों को पटमदा, गोबरघुसी, बोड़ाम, कांकीडीह और भुला बाजार के अलावा जमशेदपुर के व्यापारियों को थोक भाव में बेचते हैं. इससे उन्हें एकमुश्त कुछ राशि मिल जाती है, जिससे परिवार का भरण-पोषण होता है.

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आधुनिकता की दौड़ में पुराने रीति-रिवाज छूट जा रहे पीछे

कुम्हारों का कहना है कि भले ही आधुनिकता की दौड़ में पुराने रीति-रिवाज पीछे छूटते जा रहे हों, लेकिन मिट्टी के बर्तनों का महत्व आज भी बरकरार है. ग्रामीण इलाकों में दीपावली, विवाह, धार्मिक अनुष्ठान, मकर पर्व और पूजा-पाठ में चाक पर बने मिट्टी के बर्तनों के बिना कई रस्में अधूरी मानी जाती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मिट्टी के बर्तनों को ही सबसे शुद्ध माना जाता है. टुसू पर्व के दौरान गुड़ पीठा, मांस पीठा, उंधी पीठा सहित अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाने के लिए हाट-बाजारों में मिट्टी के बर्तनों की मांग बनी रहती है.

मिट्टी के बर्तनों की मांग में आयी कमी

हालांकि, कुम्हारों का यह भी कहना है कि पहले की तुलना में अब मिट्टी के बर्तनों की मांग में कमी आई है. प्लास्टिक, स्टील और अन्य आधुनिक बर्तनों के बढ़ते चलन के कारण नई पीढ़ी इस धंधे से दूरी बना रही है और रोजगार के लिए दूसरे विकल्प तलाश रही है. इसके बावजूद, मकर और टुसू पर्व जैसे मौकों पर मिट्टी के बर्तन आज भी ग्रामीण जीवन और परंपरा का अहम हिस्सा बने हुए हैं, जिन्हें संजोए रखने की कोशिश कुम्हार परिवार लगातार कर रहे हैं.

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Sameer Oraon

लेखक के बारे में

By Sameer Oraon

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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