बढ़ रही थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की तादाद
Updated at : 05 Dec 2017 6:30 AM (IST)
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स्वास्थ्य. हर 15 से 20 दिनों में पड़ती है खून की आवश्यकता, ब्लड बैंक पहुंच रहे बच्चे महंगा है इलाज, खून उपलब्ध कराना ब्लड बैंक के लिए बनी चुनौती परिवार में दो-दो बच्चे हैं थैलेसीमिया पीड़ित, आर्थिक संकट की मार झेल रहे सदस्य दुमका : दुमका जिले में थैलेसीमिया के मरीजों की संख्या बढ़ती जा […]
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स्वास्थ्य. हर 15 से 20 दिनों में पड़ती है खून की आवश्यकता, ब्लड बैंक पहुंच रहे बच्चे
महंगा है इलाज, खून उपलब्ध कराना ब्लड बैंक के लिए बनी चुनौती
परिवार में दो-दो बच्चे हैं थैलेसीमिया पीड़ित, आर्थिक संकट की मार झेल रहे सदस्य
दुमका : दुमका जिले में थैलेसीमिया के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है. इनके लिए समय पर खून की उपलब्धता सुनिश्चित कराना ब्लड बैंक के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं है. दुमका के ब्लड बैंक से इन दिनों करीब दो दर्जन बच्चों को खून उपलब्ध कराया जा चुका है. पर कई बार ऐसा होता है कि इन बच्चों को खून की जरूरत होती है और उस वक्त ब्लड बैंक में खून उपलब्ध नहीं होता. कुछ घरों में तो दो-दो बच्चे थैलेसीमिया से ग्रसित हैं. जिनके इलाज में परिवार की आर्थिक बोझ तले दब जाता है.
क्या है थैलेसीमिया?
थैलेसीमिया बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिक रूप में मिलने वाला रक्त-रोग है. इसमें शरीर में हीमोग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया कम हो जाती है. रक्तक्षीणता के लक्षण पैदा होने लगते हैं. लाल रक्त कण की औसत आयु 120 दिन से घटकर लगभग 10 से 25 दिन ही रह जाती है. इससे रोगी के शरीर में खून की कमी होने लगती है. उसे बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है. थैलेसीमिया के प्रमुख लक्षण में भूख कम लगना, चिड़चिड़ापन आना और शारीरिक विकास प्रभावित होना है. इसमें त्वचा रंग बिगड़ने लगता है और चेहरे की हड्डी की विकृति होने लगती है. पेट में सूजन भी हो जाता है तथा पेशाब का गहरा व गाढ़ा होने लगता है. ऐसे मरीज में बोन मैरो खून की कमी की भरपाई करने की कोशिश में फैलने लगती है. इससे चेहरे की हड्डियां मोटी और चौड़ी हो जाती है. लीवर व प्लीहा का आकार बढ़ने लगता है.
क्या है इलाज
इससे ग्रसित बच्चे को कई बार एक माह में दो से तीन बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है. हालांकि बार-बार खून चढ़ाने से शरीर में आयरन की मात्रा अधिक हो जाती है. अतिरिक्त आयरन को चिलेशन के जरिये शरीर से बाहर करने के लिए भी उपचार करना पड़ता है. बोन मैरो प्रत्यारोपण से इस रोग का इलाज सफलतापूर्वक संभव है. लेकिन बोन मैरो का मिलान एक मुश्किल व खर्चीली प्रक्रिया है.
बच्चे, जो पीड़ित हैं
सिकंदर अंसारी(15), अमरपानी, जरमुंडी
सामुएल कोल(4), ढोलककट्टा, रामगढ़
संतोष सोरेन(10), डुमरिया, जरमुंडी
सुभाष राय (10), नूनडंगाल, काठीकुंड
आर्यन हांसदा(4 ), राजबांध, दुमका
अस्तमा कुमारी(6), खबोशपुर, जरमुंडी
ब्यूटी मरांडी (8), खटंगी, जामा
वर्षा कुमारी(5 ), बासुकिनाथ, जरमुंडी
लक्ष्मी कुमारी(10 ) भैरवपुर, जामा
बादल मांझी(2 ) भैरवपुर, जामा
दीपक दास(12), डंगालपाड़ा, दुमका
फ्रांसिस हेंब्रम(5), बड़तल्ली, दुमका
अभिषेक दे(13), केंद्रघटा, मसलिया
नंदनी कुमारी(3 ), पारसिमला, दुमका
वर्षा कुमारी(9 ), पेटसार, जरमुंडी
करण हांसदा(7), खजुरडंगाल
लखन कुमार(2 ) शंकरा, काठीकुंड
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