धनबाद : चलती गाड़ी में हुई थी सकलदेव की हत्या, सुबह सवेरे मारे गये थे विनोद सिंह

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 22 Mar 2017 10:05 AM

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बिहार जनता खान मजदूर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह की हत्या 25 जनवरी, 1999 को भूली के निकट हीरक रोड पर की गयी थी. दिन के 12.50 पर हुई इस घटना में दोनों तरफ से अंधाधुंध गोलियां चली थी. श्री सिंह की टाटा जीप का ड्राइवर सह बॉडीगार्ड समेत तीन […]

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बिहार जनता खान मजदूर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह की हत्या 25 जनवरी, 1999 को भूली के निकट हीरक रोड पर की गयी थी. दिन के 12.50 पर हुई इस घटना में दोनों तरफ से अंधाधुंध गोलियां चली थी. श्री सिंह की टाटा जीप का ड्राइवर सह बॉडीगार्ड समेत तीन लोग घायल हुए थे. दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप बीआर-17-एफ 0027 पर धनबाद के लिए निकले थे.

वे आगे की सीट पर थे. गाड़ी स्व. विनोद सिंह का खासमखास रह चुका ड्राइवर सह बॉडीगार्ड मनोज सिंह चला रहा था. पीछे की सीट पर उनका निजी बॉडीगार्ड अकेला सिंह हथियार के साथ अकेले बैठा था. श्री सिंह की गाड़ी के पीछे डब्ल्यूबी-38ए-8885 अर्मदा जीप थी. उस पर भी श्री सिंह के निजी बाडी गार्डों का सशस्त्र दस्ता था. गाड़ी पप्पू सिंह चला रहा था.
आगे की सीट पर प्रमोद सिंह था, जबकि पीछे की सीट पर उदय सिंह और अशोक सिंह थे. घटना में मामूली रूप से घायल उदय सिंह और अशोक सिंह का बयान था कि हीरक रोड पर पहुंचते ही उन्होंने दो टाटा सूमो (एक सफेद) को देखा. दोनों गाड़ी आगे-आगे चल रही थी. शक जैसी कोई बात नहीं थी. इस्ट बसुरिया ओपी के काड़ामारा बस्ती के निकट सकलदेव सिंह की गाड़ी को ओवरटेक करने लगी. जैसे ही दोनों गाड़ी समानांतर हुई कि सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी. सुरेश सिंह और उनके लोगों ने दोनों को केंद्रीय अस्पताल पहुंचाया. डाक्टरों ने सकलदेव सिंह को मृत घोषित कर दिया.
सुबह सवेरे मारे गये थे विनोद सिंह
जिले के कतरास थाना क्षेत्र में स्थित कतरास बाजार भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने एके 47 जैसे अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर सकलदेव सिंह के अनुज चौंतीस वर्षीय विनोद सिंह को छलनी कर दिया. इस घटना में श्री सिंह के साथ उनके कार चालक मो. मन्नू अंसारी भी वहीं ढेर हो गया था.
सुबह आठ बज कर चालीस मिनट के आसपास भीड़ भाड़ वाले इलाके में हुई इस दुस्साहसिक घटना में एक सौ चक्र के आसपास गोलियां चली थी. विनोद सिंह के अनुज दून बहादुर सिंह द्वारा दर्ज करायी गयी प्राथमिकी में स्व. सुर्यदेव सिंह के भाई बच्च सिंह, रामधीर सिंह और पुत्र राजीव रंजन को अभियुक्त बनाया गया था. संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि कुख्यात शूटर ब्रजेश सिंह एंड ग्रुप द्वारा इस सनसनी खेज कांड को अंजाम दिलाया गया है. बच्च सिंह के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र रचने का भी आरोप था. भादवि की धारा 302, 120 बी, 26 आर्म्स एक्ट एवं 34 के तहत कतरास थाना में कांड अंकित हुआ था. विनोद सिंह अपने यहां चल रहे यज्ञ में बिना होम किए हड़बड़ी में किसी काम से निकले थे, फिर लौट कर नहीं आये.
शादी समारोह में हुई थी सुरेश सिंह की हत्या
करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की रात लगभग साढ़े नौ बजे धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी. सुरेश सिंह पुराना बाजार में एक शादी समारोह में भाग लेने के बाद धनबाद क्लब पहुंचे थे. वहां होटल जिल के मालिक नुनू सिंह के बेटे की शादी का रिसेप्शन था. यहां आते ही सुरेश सिंह अपने मुलाजिम गोपाल सिंह से कुरसी पर बैठ कर बात करने लगे. इसी बीच चार युवकों ने उन्हें घेर लिया और उनमें से एक ने रिवाल्वर निकाल कर गोलियां चलानी शुरू कर दी. घटनास्थल पर नाइन एमएम के छह खोखे मिले. चार गोली सुरेश को लगी. दो दायें-बायें सीने में और एक कंधे में. गोली लगने के बाद सुरेश गिर पड़े. उनके निजी अंगरक्षकों और समारोह में जुटे लोगों ने एक पवन सिंह को पकड़ लिया. इस हत्या में रामाधीर सिंह के पुत्र शशि सिंह नामजद हैं. अभी भी फरार हैं.
प्रमोद सिंह की हुई थी हत्या
3 अक्तूबर, 2003 को महाअष्टमी के दिन बनारस से धनबाद लौटे प्रमोद सिंह की हत्या कर दी गयी. बनारस से धनबाद लौटे प्रमोद सिंह ने आवास की सीढ़ियों पर कदम रखा भी नहीं था कि वहां छुपे दो युवकों ने 9 एमएम की पिस्टल की गोलियों से प्रमोद को छलनी कर दिया. घायल प्रमोद को अस्पताल ले जाने वालों में कोयला व्यवसायी सुरेश सिंह, रिश्तेदार रणविजय सिंह और सहयोगी संतोष सिंह के अलावा हत्याकांड का प्रत्यदर्शी गवाह पप्पू सिंह, प्रयाग सिंह आदि शामिल थे. अस्पताल में प्रमोद तो नहीं बचा, परंतु उसकी मौत के बाद उसके कथित मृत्युपूर्व बयान ने जलजला ला दिया. बयान में सिंह मैंशन परिवार के रामधीर सिंह और राजीव रंजन को गोली दागने वाले शख्सों के रूप में आरोपित किया गया था. तब धनबाद के एसपी मुरारीलाल मीणा थे. श्री मीणा ने फौरी कार्रवाई की.
मामला दर्ज हुआ और पुलिस बल झरिया के कतरास मोड़ पहुंचा. कतरास मोड़ में रामधीर सिंह दुर्गा पाठ पर बैठे हुए थे. रामधीर की गिरफ्तारी हो गयी. इसी बीच तत्कालीन मंत्री व रामधीर सिंह के भाई बच्च सिंह वहां पहुंचे और पुलिस हिरासत से भाई को जबरन छुड़ा लिया. इस पर भी बावेला मच गया. इधर, राजीव रंजन ऐसे फरार हुए कि आज तक उनका कोई अता-पता नहीं. मृत्युपूर्व बयान में प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को नजर अंदाज कर सुरेश, रणविजय व संतोष को गवाह बनाया गया. हत्याकांड तूल पकड़ता जा रहा था.
पुलिस ने भी सिंह मैंशन पर शिकंजा कस रखा था. स्थिति बिगड़ती देख बच्च सिंह ने पुलिस कार्रवाई को सीधे तौर पर एकपक्षीय बताते हुए सीआइडी जांच की मांग कर डाली. तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने सीबीआइ जांच की अनुशंसा कर चौंका दिया. गृह सचिव जेबी तुबिद ने 11 अक्तूबर, 2003 को पुलिस से जांच भार वापस लेने के साथ सीबीआइ की जांच से संबंधित याचिका पर हस्ताक्षर कर अधिसूचना जारी कर दी. 31 अक्तूबर, 2003 को नयी दिल्ली से सीबीआइ की विशेष अपराध शाखा की टीम धनबाद आयी और हत्याकांड से जुड़े कागजात हासिल किया. केस के पहले अनुसंधान कर्ता थे सीबीआइ के इंस्पेक्टर एमएल मीणा.
जांच आरंभ हो गयी. बड़ी कामयाबी 18 अगस्त, 2004 को बलिया में रामधीर सिंह की गिरफ्तारी के साथ मिली. रामधीर सिंह से गहन पूछताछ में भी हत्याकांड पर कोई रोशनी नहीं पड़ी. फिर जांच का जिम्मा सीबीआइ के युवा इंस्पेक्टर मुकेश शर्मा को दिया गया. मुकेश शर्मा ने ही बिहार के गया में हुए बहुचर्चित सत्येंद्र दुबे हत्याकांड का राजफाश किया था.
मुकेश शर्मा के नेतृत्व में कई स्थानों पर निरंतर दबिश, पूछताछ व सत्यापन के बावजूद न तो हत्यारों का कुछ पता चल पा रहा था और न ही हत्या के कारणों का. हत्याकांड में अहम ब्रेक थ्रू मिला- केंदुआ निवासी फनेश सिंह, करकेंद गुरुद्वारा निवासी दीपू सेन और वासेपुर निवासी मो आजाद की गिरफ्तारी से. तीनों को केंदुआडीह पुलिस ने 20 नवंबर, 2003 को एक नाइन एमएम की एक पिस्टल के साथ पकड़ा था और कांड संख्या 100-03 दर्ज कर आर्म्स एक्ट में जेल भेजा था.
सीबीआइ को जब इस तथ्य की जानकारी मिली तो 19 मई, 2006 को तीनों को धनबाद कोर्ट परिसर से गिरफ्तार कर 10 दिनों की रिमांड पर दिल्ली ले गयी. बरामद पिस्टल का वैज्ञानिक परीक्षण हुआ तो सीबीआइ के हौसले बुलंद हो गये. उसी पिस्टल की गोलियों से प्रमोद सिंह को मारा गया था. उसके बाद तो कड़ियां जुड़ती चली गयी. 22 जुलाई, 2006 को बराकर में महेंद्र पासवान पकड़ा गया.
27 अगस्त को हीरा खान ने आत्मसमर्पण कर दिया. एक सितंबर को वासेपुर में कश्मीरा खान, नन्हे खान और सैयद अरशद की गिरफ्तारी हुई. 72 वर्षीय खड़ग सिंह भी फंदे में आ फंसा. अहम कार्रवाई 19 सितंबर को हुई, जब कोयला व्यवसायी सुरेश सिंह की गिरफ्तारी के साथ घोषणा कर दी गयी कि यही शख्स प्रमोद हत्याकांड का मास्टर माइंड है. सीबीआइ ने अपनी छानबीन में नामजद आरोपी रामधीर सिंह और राजीव रंजन सिंह को क्लीनचिट दे दी.
राजू यादव, पानी पीने गये थे कि मार डाला
25 सितंबर 1991 को नयी दिल्ली में जनता दल की विशाल रैली थी. राजू यादव अपने हजारों समर्थकों के साथ भागा स्टेशन से नीलांचल एक्सप्रेस पकड़ कर दिल्ली रवाना हुए. 26 सितंबर, दिन गुरुवार की सुबह मुगलसराय स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तब उनका दुर्भाग्य खींच कर प्लेट फार्म पर ले गया. वे मुंह हाथ धोने के लिए ट्रेन से जैसे ही उतरे और नल पर झुक कर पानी हाथ में लेना चाहे, वैसे ही अपराधियों ने गोलियों की बौछार कर दी. घटना की सूचना पाते ही मुलायम सिंह यादव व लालू यादव मुगलसराय स्टेशन पहुंचे. वहां से एक स्पेशल ट्रेन में शव को लेकर लालू प्रसाद यादव स्वयं धनबाद पहुंचे. उस समय धनबाद के एसपी अशोक कुमार गुप्ता थे. बाद में राजू यादव की पत्नी आबो देवी झरिया की विधायक और अविभाजित बिहार में मंत्री बनी.
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