संताल हूल को इतिहास में मिले सम्मानजनक स्थान

Updated at : 30 Jun 2023 8:41 AM (IST)
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संताल हूल को इतिहास में मिले सम्मानजनक स्थान

30 जून 1855 को मौजूदा साहेबगंज ज़िले के भोगनाडीह गांव में वीर सिदो-कान्हो और चांद-भैरव के नेतृत्व में 400 गांवों के लगभग 50000 लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत से आमने-सामने की जंग का एलान किया था

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डॉ विमल प्रसाद सिंह

संथाली भाषा में हूल का शाब्दिक अर्थ ”विद्रोह” है. यह पटकथा उस विद्रोह की है जो 1855 ई. में संताल परगना के वीरों और वीरांगनाओं ने अंग्रेजी हुकिमत के खिलाफ धरती आबा सिद्धो और कान्हू के नेतृत्व में लड़ा था. जब भारत की आज़ादी के बारे में जब भी कोई बात होती है तो 1857 के विद्रोह को अंग्रेज़ों के खिलाफ पहला विद्रोह कहा जाता है, लेकिन इससे पहले संताल परगना के धरती से वीर सिदो कान्हू के नेतृत्व में मौजूदा साहेबगंज ज़िले के भोगनाडीह गांव 30 जून 1855 को एक ऐसा विद्रोह हुआ था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिलाकर रख दी थी.

इस मौक़े पर वीर सिद्धू मुर्मू ने नारा दिया था ‘करो या मरो, अंग्रेज़ों हमारी माटी छोड़ो’ इसी दिन को आज हम सभी हूल दिवस रूप में मनाते है. इतिहास में अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी से इस विद्रोह को सिर्फ स्थानीय साहूकारों के खिलाफ आदिवासियों के द्वारा किया गया एक जनांदोलन दिखाया. लेकिन सचाई यह है की यह विद्रोह अंग्रेजी हुकूमत को अस्वीकार करने, भू-राजस्व नहीं देने एवं अपने आप को स्वतंत्र घोषित करने के लक्ष्य से किया गया था, फिर हम इसे स्वतंत्रता की पहली लड़ाई क्यों नहीं मानते है?

इस पर विचार करने की आवश्यकता है. इस जनविद्रोह में 30 जून 1855 को मौजूदा साहेबगंज ज़िले के भोगनाडीह गांव में वीर सिदो-कान्हो और चांद-भैरव के नेतृत्व में 400 गांवों के लगभग 50000 लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत से आमने-सामने की जंग का एलान किया था एवं मालगुजारी नहीं देने और अंग्रेजो हमारी माटी छोड़ो का जोर-शोर से एलान किया. अंग्रेजों ने तब संथाल विद्रोहियों से घबराकर उनका दमन प्रारंभ कर दिया.

विद्रोहियों को सबक सिखाने के लिए अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं और इस विद्रोह का नेतृत्व करने वाले चार भाई में से दो भाई चांद और भैरव को अंग्रेजों ने मार डाला. इसके बाद सिदो और कान्हो को भोगनाडीह में ही पेड़ से लटकाकर 26 जुलाई 1855 को अंग्रेजों ने फांसी दे दी. लेकिन जब तक एक भी आंदोलनकारी जिंदा रहा, वह लड़ता रहा. इस युद्ध में करीब 20 हजार आदिवासियों ने अपनी जान दी थी और इस तरह से अंग्रेजों के दमन से इस महान क्रांति का अंत हो गया, जिसमें हजारों वीर और वीरांगनाओं ने अपनी शहादत दी.

हजारों जेल में बंदी बनाकर रखे गये. इन सभी के बावजूद वीर सिदो-कान्हू एवं चांद-भैरव के नेतृत्व में संथाल परगना (तत्कालीन – बंगाल प्रेसिडेंसी का हिस्सा) के धरती से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाप किया गया विद्रोह को बड़े निर्दयी तरीक़े से इक्का-दुक्का इतिहासकारों छोड़ कर बाकियों ने इतिहास के पन्नों में दबा दिया गया.

इस विद्रोह को महज साहूकारों के खिलाफ किया गया जनांदोलन इसलिए नहीं माना जा सकता है क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य न सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत को लगान न देना था, बल्कि इसका उदेश्य अंग्रेजी हुकूमत का पराधीनता को अस्वीकार करना भी था. इस आंदोलन ने तत्कालीन को बड़े नीतिगत परिवर्तन करने पर मजबूर कर दिया था. यही वो कारण जान पड़ता है कि आज के दिन को आदिवासी समाज पूरे उल्लास से मनाता है और अपने वीर सिद्धू, कान्हू और चांद-भैरव को याद करता है.

इस क्रांति में बलिदान देने वाले वीर और वीरांगनाओं के इस साहस के लिए पूरा देश आज भी उनको सलाम करता है. मेरा व्यक्तिगत विचार है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम का पहला विद्रोह 30 जून 1855 को हुए उस हूल क्रांति को माना जाये जिसने अंग्रेजी हुकूमत की जड़े हिलाकर रख दिया था. यही उस विद्रोह में शहीद हुए वीर और वीरांगनाओं के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

(कुलपति, एसकेएमयू, दुमका)

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