संस्कृति: मिट्टी के धंधे से कुम्हारों का हो रहा मोहभंग दीये कैसे बनायें, जब इनके घर में हो अंधेरा
देवीपुर: गुरुवार को दिवाली है. कुछ साल पहले तक दिवाली के समय कुम्हारों का उत्साह देखते ही बनता था. पूरे परिवार के साथ मिलकर कुम्हार दीये बनते थे. लेकिन अब क्षेत्र के कुम्हारों का अब उनके पुश्तैनी धंधे से मोहभंग होता जा रहा है. हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी उनकी बनाई सामग्री का उचित मूल्य […]
देवीपुर: गुरुवार को दिवाली है. कुछ साल पहले तक दिवाली के समय कुम्हारों का उत्साह देखते ही बनता था. पूरे परिवार के साथ मिलकर कुम्हार दीये बनते थे. लेकिन अब क्षेत्र के कुम्हारों का अब उनके पुश्तैनी धंधे से मोहभंग होता जा रहा है. हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी उनकी बनाई सामग्री का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है.
बढ़ती महंगाई एवं गृहस्थी चलाने में उपयोग होने वाली जरूरी वस्तुओं की कीमतों में आयी बेतहाशा वृद्धि ने उनकी हालत खस्ता कर दी है. इससे उनके सामने रोजी-रोटी चलाने की समस्या उत्पन्न होती जा रही है. क्षेत्र के कई कुम्हारों से संपर्क करने पर उन्होंने कहा कि वे लोग तो अपने पुश्तैनी धंधे को किसी तरह ढो रहे हैं. लेकिन आने वाली पीढ़ी शायद ही इस धंधे को अपनाएगी. कुम्हार अपने पूरे परिवार के साथ दिन-रात मेहनत करके मिट्टी का दीया, बर्तन, सुराही, घड़ा का निर्माण करते हैं. लेकिन इनके कद्रदानों की कमी हो गयी है. इस धंधे से इन लोगों को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती है, तो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा कहां से दे पायेंगे.
सुरेश पंडित, वीरेद्र पंडित सहित दर्जनों कुम्हारों ने कहा कि एक समय था जब दीपावली पर दीये की मांग काफी होती थी. लोग अपने-अपने घरों में मिट्टी के दीये जलाते थे. अब तो लोग चाइनीज सजावट के सामान से घर सजा लेते हैं.
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