पूर्वजों के प्रतीक से मां मनसा के आगमन तक, कसमार की अनोखी पूजा परंपरा

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फोटो : खैराचातर में पूजा की तैयारी में जुटे श्रद्धालु फोटो : झालदा से सेवाती घाटी के रास्ते प्रतिमा लेकर जाते श्रद्धालु | Prabhat Khabar Network

बोकारो के कसमार में बारि पूजा और मां मनसा की आराधना की सदियों पुरानी परंपरा है। जानें कैसे प्रकृति और आस्था का यह पर्व दो अलग रूपों में मनाया जाता है।

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बोकारो जिला के कसमार प्रखंड में मनसा पूजा की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. वर्षा ऋतु में मनाये जाने वाले इस पर्व में कहीं पवित्र जल यानी बारि को देवइती-देवइता और पूर्वजों का प्रतीक मानकर पूजा जाता है, तो कहीं इसी बारि को मां मनसा के आगमन का प्रतीक मानकर उनकी प्रतिमा स्थापित कर आराधना की जाती है. इस तरह एक ही पर्व यहां दो अलग धार्मिक परंपराओं के रूप में दिखाई देता है.

कुड़मी समाज में बारि ही पूजा का केंद्र

कुड़मी समाज में इस पर्व का प्रमुख स्वरूप बारि पूजा का है. बारि को जल, वर्षा, कृषि, पूर्वज और राइ-रइआ (देवइती-देवइता) का प्रतीक माना जाता है. धान की रोपनी पूरी होने के बाद होने वाली इस पूजा में अच्छी वर्षा, पर्याप्त जल और अच्छी फसल की कामना की जाती है.

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संध्या समय श्रद्धालु तालाब, नदी अथवा अन्य जलस्रोत से कलश में बारि लेकर पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ पूजा स्थल तक पहुंचते हैं. बारि को घर के भूतपिंड़ा में स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है. कई परिवार अपनी मनौती और पारिवारिक परंपरा के अनुसार बकरा, बतख अथवा कबूतर की बलि भी देते हैं. अगले दिन पारण के साथ पूजा संपन्न होती है.

नई उपज का पहला अंश पूर्वजों को

बारि पूजा का संबंध बाड़िबंधा की परंपरा से भी जुड़ा है. नयी उपज का पहला अंश राइ-रइआ और पूर्वजों को अर्पित करने की परंपरा कृषि जीवन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को दर्शाती है. ग्रामीण मान्यता है कि खेत की उपज केवल किसान के श्रम का परिणाम नहीं, बल्कि भूमि, वर्षा, जल, प्रकृति और पूर्वजों के आशीर्वाद का भी प्रतिफल है.

बारि से शुरू होती है मां मनसा की पूजा

बंगाली तथा अन्य हिंदू समुदायों में यही पर्व मुख्य रूप से मां मनसा की पूजा के रूप में मनाया जाता है. लोकविश्वास में मां मनसा को नागों की अधिष्ठात्री तथा सर्पदंश और अन्य अनिष्टों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है. यहां भी पूजा की शुरुआत जलाशय से बारि लाने से होती है. श्रद्धालु कलश में पवित्र जल लेकर पूजा स्थल पहुंचते हैं. बारि को मां मनसा के आगमन का प्रतीक मानकर प्रतिमा के समक्ष स्थापित किया जाता है. इसके बाद पुजारी द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है.

खैराचातर में डेढ़ सौ साल पुरानी परंपरा

कसमार में बारि से प्रतिमा पूजा तक के विकास की खास झलक खैराचातर में मिलती है. स्थानीय बुजुर्ग पवन हजाम और मही हजाम के अनुसार उनके परिवार में यह परंपरा करीब डेढ़ सौ वर्ष पुरानी है. शुरुआती दौर में यहां प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती थी. परिवार के लोग तालाब से बारि लाकर उसकी पूजा करते थे.

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समय के साथ मनोकामना पूर्ण होने पर मां मनसा की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा शुरू हुई. धीरे-धीरे प्रतिमा पूजा का स्वरूप व्यापक होता गया. इसके बावजूद मूल बारि परंपरा आज भी कायम है. वर्तमान में भी खैराचातर में हजाम परिवार द्वारा सबसे पहले बारि लाने की रस्म निभाई जाती है. इसके बाद पुजारी मां मनसा की प्रतिमा के समक्ष पूजा-अर्चना कराते हैं.

इसी तरह नाई टोला में भी 70 वर्ष पुराना इतिहास है और वहां भी शुरुआत में बारि पूजा होती थी. राखो हरि ठाकुर ने मन्नत पूरी होने पर इस पूजा की शुरुआत की थी. उनके पुत्र निर्मल ठाकुर, पौत्र दिलीप हजाम आदि ने बताया कि कालांतर में मूर्ति स्थापित कर यहां धूमधाम से पूजा करने की परंपरा चली आ रही है.

खैराचातर में करीब 25 स्थानों पर होती है पूजा

खैराचातर के अलावा बगदा, सुरजुडीह, कसमार, मंजूरा, खुदीबेड़ा, चट्टी, उदयमारा, चंडीपुर, मधुकरपुर, दांतू समेत प्रखंड के प्रायः सभी गांवों में मनसा पूजा होती है. खैराचातर में करीब 25 स्थानों पर मां मनसा की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं. कई स्थानों पर स्थायी मंदिर हैं, जबकि कुछ जगहों पर प्रत्येक वर्ष नई प्रतिमा स्थापित कर सामुदायिक पूजा की जाती है.

सुरजुडीह और खुदीबेड़ा की अपनी पहचान

सुरजुडीह की मनसा मंगल लोकनाट्य परंपरा इस पर्व को अलग सांस्कृतिक पहचान देती है. वहीं खुदीबेड़ा में पंचम महतो के परिवार की वर्षों पुरानी विशिष्ट परंपरा है. यहां मां मनसा की एक प्रतिमा पूरे वर्ष स्थापित रहती है और पूजा के अवसर पर उसके साथ नयी प्रतिमा स्थापित की जाती है. पूजा के बाद पुरानी प्रतिमा का विसर्जन कर नई प्रतिमा को अगले वर्ष तक नित्य पूजा के लिए रखा जाता है.

एक पर्व, दो धार्मिक स्वरूप

कसमार की मनसा-बारि पूजा में एक ही जल परंपरा के दो सांस्कृतिक रूप दिखाई देते हैं. कुड़मी समाज में बारि स्वयं पूजा का केंद्र है, जबकि बंगाली और अन्य हिंदू समुदायों में वही बारि मां मनसा के स्वागत और प्रतिमा पूजा का आधार बनती है. यही विविधता इस पर्व को कसमार के लोकजीवन, कृषि संस्कृति और धार्मिक परंपरा की विशिष्ट पहचान बनाती है.


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दीपक सवाल

लेखक के बारे में

By दीपक सवाल

मैं दीपक सवाल, 1994 से प्रभात खबर से जुड़ा हूं। वर्ष 2011 से 2015 तक बोकारो कार्यालय में स्टॉफ रिपोर्टर के रूप में कार्यरत रह चुका हूं। 2015 से कसमार डेटलाइन से कार्यरत हूं। मेरा संपर्क नंबर : 9431145607

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