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200 साल से उसरडीह गांव में हो रही है बैसाखी काली पूजा

Updated at : 06 May 2024 1:05 AM (IST)
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200 साल से उसरडीह गांव में हो रही है बैसाखी काली पूजा

आज संजोत के साथ शुरू होगी तीन दिवसीय पूजा-अर्चना

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तलगड़िया.

चास प्रखंड की बेलुंजा पंचायत के उसरडीह गांव में 200 वर्षों से बैसाखी काली पूजा हो रही है. यह मंदिर आस्था व विश्वास का केंद्र बना हुआ है. पूजा शुरू होते ही उसरडीह, पैलाडीह, बेलुंजा, बांधडीह, सालगाटांड़ व आसपास के गांव का माहौल भक्तिमय हो जाता है. परंपरा के अनुसार मंदिर में मां काली की मूर्ति का निर्माण किया जा रहा है. मंदिर का रंग रोगन व भव्य सजावट की जा रही है. पंडित चंडीचरण ख्वास, रणजीत ख्वास ने बताया कि छह मई (सोमवार) को संयोत से तीन दिवसीय पूजा-अर्चना की विधिवत शुरुआत होगी. सात मई को निर्जला उपवास रख कर श्रद्धालु रात्रि में पूजा-अर्चना करेंगे. सिंघी बांध में स्नान कर श्रद्धालु दंड देकर मंदिर पहुंच कर पूजा-अर्चना करेंगे. बकरा बली के बाद रात्रि में प्रसाद वितरण तथा भंडारा का आयोजन किया जायेगा. पश्चिम बंगाल के आसनसोल की टीम द्वारा आठ मई की रात्रि नौ बजे से भक्ति जागरण प्रस्तुति किया जायेगा. पूजा को लेकर अवनी ख्वास, चंडी ख्वास, रणजीत ख्वास, त्रिपुरारी ख्वास, दुलालचंद ख्वास, कराली चंद्र ख्वास, प्रकाश ख्वास, खुदीराम ख्वास, सुलचना चटर्जी, प्रबोध ख्वास, विकास ख्वास, भोलानाथ ख्वास, विधान ख्वास, महेश्वर ख्वास, विल्कुल कुमार, विपिन ख्वास, अक्षय ख्वास, तारकनाथ ख्वास, नीलकंठ ख्वास आदि लोग जुटे हुए हैं.

कैसे हुई पूजा की शुरुआत :

उसरडीह गांव में स्व. दिवाकर खवास की पत्नी स्व, लखीवाला देवी ने मन्नत पूरी होने पर मां काली की मूर्ति स्थापित कर पूजा की शुरुआत की. लखीवाला देवी अपने मायके चंदनकियारी के बरमसिया गांव में थी. उसी समय उनके पुत्र काशीनाथ ख्वास गंभीर बीमारी से पीड़ित था. लखीवाला ने वहीं पर मां काली मंदिर में पूजा कर पुत्र के स्वस्थ होने की मन्नत मांगी. इसके बाद काशीनाथ ख्वास स्वस्थ हो गये. लखीवाला देवी ने उसरडीह में बांस, पुआल व तिरपाल से झोपड़ीनुमा मंदिर का निर्माण कर पूजा-अर्चना शुरू की. कुछ समय के बाद भव्य मंदिर का निर्माण किया गया. उसी समय से ख्वास परिवार विधिवत पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं. मंदिर में सच्चे मन से पूजा अर्चना करने से मन्नत पूरी होती है. मन्नत पूरी होने पर चढ़ावा चढ़ाया जाता. पूजा-अर्चना के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं. मां की मूर्ति विसर्जन के साथ ही पूजा संपन्न हो जाती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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