496 वोट से हारे, अगला चुनाव 472 वोटों से जीते थे हरदयाल

Updated at : 03 Dec 2019 1:51 AM (IST)
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496 वोट से हारे, अगला चुनाव 472 वोटों से जीते थे हरदयाल

बोकारो जिला के विधानसभा सीटों में होता रहा है नजदीकी मुकाबला, कई जीत का अंतराल 500 से कम दीपक सवाल, कसमार : चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रत्याशी पूरी ताकत झोंक देते हैं. तरह-तरह के उपाय और हथकंडे अपनाते हैं. इन सबके बाद विधानसभा चुनावों में हार-जीत का अंतराल 500 से भी कम […]

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  • बोकारो जिला के विधानसभा सीटों में होता रहा है नजदीकी मुकाबला, कई जीत का अंतराल 500 से कम
दीपक सवाल, कसमार : चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए प्रत्याशी पूरी ताकत झोंक देते हैं. तरह-तरह के उपाय और हथकंडे अपनाते हैं. इन सबके बाद विधानसभा चुनावों में हार-जीत का अंतराल 500 से भी कम वोटों से हो, तो चुनाव की रोचकता और कांटे के संघर्ष से बने माहौल का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है.
बोकारो जिला के विधानसभा चुनावों में भी कई बार जीत का अंतराल 500 से भी कम रहा है. वर्ष 1952 में हुए पहले चुनाव से ही बोकारो में जीत का अंतर केवल 496 मतों का था. चास विधानसभा के लिए 1952 के चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी हरदयाल शर्मा को निर्दलीय प्रत्याशी देव शंकरी प्रसाद सिंह से महज 496 वोटों से पराजय हाथ लगी थी. हालांकि 1957 के चुनाव में हरदयाल शर्मा जीत गये.
उन्होंने जनता पार्टी के पार्वती चरण महतो को हराया. लेकिन, जीत का अंतर केवल 472 वोट ही था. 1967 के चुनाव में भी एक ऐसा ही रोचक मुकाबला हुआ. तब जरीडीह विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में स्वतंत्र प्रत्याशी एस मंजरी ने ठाकुर सरयू प्रसाद ठाकुर से महज 407 वोटों के अंतराल से जीत दर्ज की थी. इस चुनाव में श्री ठाकुर भी निर्दलीय ही थे. वर्ष 1969 में भी जरीडीह में ऐसा ही नजदीकी मुकाबला हुआ.
इस बार बीजेएस के छत्रुराम महतो के हाथों जेएपी के प्रत्याशी शशांक मांझी को 672 वोटों से हार का मुंह देखना पड़ा था. बोकारो विधानसभा में भी एक बार ऐसा ही रोचक रोमांचक मुकाबला 1977 में हो चुका है. विस्थापित नेता इमामुल हई खान सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे, पर उन्हें निर्दलीय प्रत्याशी समरेश सिंह के हाथों महज 205 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था.
चंदनकियारी सीट पर भी नजदीकी मुकाबला हो चुका है. वह 1995 का विधानसभा चुनाव था. 1990 के चुनाव में भाजपा से जीत चुके गौर हरिजन ने इस बार भाजपा के टिकट से लड़ने से इंकार कर दिया था.
उस समय समरेश सिंह ने राज्य के कतिपय नेताओं के साथ मिल कर संपूर्ण क्रांति दल बनाया था. श्री हरिजन ने समरेश सिंह से प्रभावित होकर भाजपा की बजाय इसी दल से चुनाव लड़ा. हालांकि, वह झामुमो प्रत्याशी हारू रजवार से सिर्फ 174 वोटों के मामूली अंतर से हार गये थे.
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