97 वर्ष की उम्र में भी नहीं छूटी तबला की थाप

Updated at : 05 Sep 2018 5:42 AM (IST)
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97 वर्ष की उम्र में भी नहीं छूटी तबला की थाप

सकलदेव शर्मा लगनशील बच्चों को देते है नि:शुल्क प्रशिक्षण चास : चास के भवानीपुर साइड निवासी सकलदेव शर्मा 97 वर्ष की उम्र में भी बच्चों को तबला वादन सिखा रहे हैं. इसके लिए वह खुद भी जमकर अभ्यास करते हैं. यह सिर्फ सिखाने की ललक नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक अनुराग है. जिस कारण वह […]

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सकलदेव शर्मा लगनशील बच्चों को देते है नि:शुल्क प्रशिक्षण

चास : चास के भवानीपुर साइड निवासी सकलदेव शर्मा 97 वर्ष की उम्र में भी बच्चों को तबला वादन सिखा रहे हैं. इसके लिए वह खुद भी जमकर अभ्यास करते हैं. यह सिर्फ सिखाने की ललक नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक अनुराग है. जिस कारण वह संगीत के विरासत को बचाने के प्रयास में लगे है. वर्तमान में ये 22 बच्चों को प्रशिक्षण दे रहे हैं. इसमें चार बच्चों को यह नि:शुल्क प्रशिक्षण दे रहे है. इनकी फीस दो सौ रुपये प्रति माह है. मूल रूप से बिहार के मुजफ्फरपुर, थाना सारेयो, गांव रेवा निवासी श्री शर्मा ने बताया कि उन्हें तबला के प्रति लगाव 13 वर्ष की उम्र में हो गया था. एक बार रेडियो पर विविध भारती पर तबला वादन की धुन सुनी, तभी से मन में ठान लिया कि तबला बजाने के लिये वह सीखेंगे.
छह अप्रैल 1921 को जन्में श्री शर्मा ने 25 वर्ष की उम्र में 1946 को तबला वादन सीखने के लिये भागलपुर स्थित पुलिस विभाग (अंग्रेजी शासन) में सिपाही के पद पर ज्वाइन किया. उन्हें जानकारी मिली थी कि यहां के मेजर को तबला वादन आता है. लेकिन उन्हें यहां निराशा मिली. ऐसे में उन्होंने देश आजाद होने के बाद 1953 में बिहार के जहानाबाद में दारोगा के पद पर रहते हुये इस्तीफा दे दिया. तबला सीखने की चाहत उन्हें पुन: मुजफ्फरपुर ले आयी. खुद से ही तबला का अभ्यास करने लगे.
1956 में पटना रेडियो में किया था ज्वाइन : वर्ष 1956 में उन्होंने पटना रेडियो में तबला वादक के रूप में ज्वाइन किया. इस दौरान उन्होंने कई कार्यक्रम प्रस्तुत किये. 1965 तक भलीभांति कार्य करने के दौरान अचानक उन्हें मलेरिया ने अपनी चपेट में ले लिया. इसी दिन कार्यक्रम भी प्रस्तुत करना था. इसलिये उन्होंने इलाज के लिये ओवरडोज दवा ले लिया. इससे कार्यक्रम तो ठीक-ठाक रहा, लेकिन उनकी बीमारी और बढ़ गयी. इससे उनकी आंखें दिखायी देनी और कान सुनाई देनी बंद हो गयी. वह अपना इलाज चंडीगढ़ स्थित सेना के अस्पताल में करवाया. जहां उनकी आंखों की रोशनी लौटी, लेकिन एक कान से बिल्कुल भी सुनाई नहीं देने लगा. इससे उन्हे काफी दुख हुआ और तबला वादन छूट गया.
1980 में फिर शुरू किया तबला वादन
श्री शर्मा बताते हैं कि वह अपने परिवार के साथ 1980 में बोकारो आये. यहां को-आपरेटिव कॉलोनी के प्लॉट नंबर 158 में रहने लगे. अपने मन को बहलाने के लिये तबला वादन घर पर ही करते थे. 1984 में उन्होंने बोकारो स्टील सिटी के सेक्टर-5 में आदर्श संगीत महाविद्यालय में एक प्रशिक्षक के रूप में कार्यभार संभाला. साथ ही इस दौरान कुछ विद्यार्थियों को उनके घर में जाकर भी तबला वादन सीखाने लगे. इसके बाद महाविद्यालय में प्राचार्य बने. महाविद्यालय में कार्यभार समाप्त होने के बाद चास के भवानीपुर साइड में आकर बस गयें.
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