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उरांव भाषा में सरहुल का है अलग नाम, जानिए इससे जुड़ी रोचक कथा

Updated at : 11 Apr 2024 1:32 PM (IST)
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Sarhul 2025

Sarhul 2025

झारखंड में 11 अप्रैल को सरहुल पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है. इस पर्व को उरांव भाषा में अलग नाम से जाना जाता है.

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– बुधुआ उरांव-

Sarhul in jharkhand : सरहुल पर्व सृष्टि पर आई महाप्रलय से संबंधित है. उरांव आदिवासी अपने दिलों में उस महाप्रलय की घटना को बसाकर रखे हैं और गानों के रूप में व्यक्त करते हैं. यह गाना आदिवासियों के धर्म ग्रंथ के रूप में काम कर रहा है. आदिवासियों के गानों में पूरे ब्रह्मांड और प्रकृति की रूपरेखा सुनने को मिलती है. आदिवासियों का इतिहास इन्हीं गानों में सुनने को मिलता है. आदिवासी के गानों के अनुसार उन घटनाओं में जब वहां पर महाप्रलय आई थी. इस महाप्रलय में दुनिया के सब जीव जंतु मर गए. इस धरती पर पूरी दुनिया शून्य हो गई थी. केवल एक भाई और एक बहन को दुनिया में सृष्टि के लिए दुनिया के मालिक ने बचा कर रखा. सरना मां और धर्मे बाबा ने खकड़ा को बिल में छिपा कर रखा था. आदिवासियों के गानों के अनुसार खकड़ा ने भी सृष्टि में योगदान किया है.

दुनिया में केवल एक भाई और एक बहन बचे. इन बच्चों को खकड़ा के बिल से लाकर सरना मां और धर्मे बाबा ने अपने पास एक ऊंचे पर्वत में रखा, जब कुछ दिन बीते तो ये भाई और बहन बड़े हो गए. इन दोनों के एक शिशु का जन्म हुआ. इसी खुशी में सरना मां और धर्मे बाबा और बचे हुए भाई-बहन ने पर्व मनाया. इस पर्व को उरांव भाषा में खद्दी कहते हैं.

इस सरहुल पर्व में सरना मां और धर्मे बाबा ने उन भाई और बहन को अवगत कराया की खकड़ा को खोज कर लाओ और पर्व के दिन अपने घर में रखो, क्योंकि इसी खकड़ा ने आप लोगों का जान बचाने में मदद की है. अभी भी लोग सरहुल के दिन अपने घर में खकड़ा खोज कर लाते हैं और घर पर रखते हैं, जहां पर ये लोग रहते थे, वहां पर आदमी के रूप में सरना मां और धर्मे बाबा रहा करते थे. वहां उन लोगों के लिए पानी पीने के लिए छोटा सा कुआं भी बना दिया गया. अब भी वह कुआं है, जो कभी नहीं सूखता है, इसको हम लोग ढकनी चुआं के नाम से जानते हैं. इससे लोग पानी पीते हैं.

सरहुल आदिवासियों की खुशी और उल्लास का त्योहार है. महाप्रलय के बाद बचे भाई और बहन के पहले बच्चे के जन्म पर सरना मां और धर्मे बाबा ने खुशी मनाई. नए शिशु का जन्म चैत्र महीने के द्वितीय में हुआ था. जहां पर यह ऐतिहासिक घटना घटी थी, उस स्थान को सिरे सीता और ककड़ो लता के नाम से जाना जाता है. इस तरह हर साल आदिवासी लोग चैत्र महीने के द्वितीय में खद्दी पर्व मनाते हैं. और यह त्योहार सृष्टि से संबंधित है. भगवान सरना मां और धर्मे बाबा ने प्रकृति के जैसे ही सृष्टि रची. चैत्र महीने में पेड़ों से पत्ते गिर जाते हैं. और नया-नया पत्ता पेड़ में उग आता है. पूरी धरती माँ नया रूप-रंग ले लेती है. हर पेड़ पौधे में नया जीवन आ जाता है. इस तरह सरहुल पर्व को प्रकृति का पर्व भी कहते हैं.

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उरांव आदिवासी लोग पहले भगवान का साक्षात् दर्शन करते थे. उस समय घर नहीं था. पेड़ पौधे और गुफाओं में रहते थे. उस समय सखुआ पेड़ के नीचे जंगल में रहते थे. वहीं पेड़ पौधे के नीचे धरती मां, सरना मां और धर्मे बाबा के नाम से पूजा पाठ करते थे. सरना मां इन लोगों को साक्षात दर्शन देती थी. सरहुल के दिन साल के फूल, जिसको की सरई फूल कहते हैं, सरना मां और धर्मे बाबा के नाम से धरती मां को चढ़ाते हैं. सरहुल में केवल सरई फूल ही चढ़ता है, इसलिए साल का पेड़ सरहुल से जुड़ा हुआ है. सरहुल पर्व को आदि धर्म के नाम से भी जानते हैं. यह जिंदगी की शुरुआत का पर्व है. यह पर्व सतयुग से अभी तक मनाते चले आ रहे हैं.

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