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चार सौ वर्षों से गोविंदपुर सिंघाड़ा शक्तिपीठ में मां की पूजा

Updated at : 27 Sep 2019 1:20 AM (IST)
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चार सौ वर्षों से गोविंदपुर सिंघाड़ा शक्तिपीठ में मां की पूजा

हाजीपुर/महुआ : जिले की प्रसिद्ध शक्तिपीठ गोबिंदपुर सिंघाड़ा वाली मइया की पूजा पिछले चार सौ वर्षों से धूमधाम से पूजा करने की परंपरा चली आ रही है. मइया के दरबार में सच्चे मन से आने वाले श्रद्धालुओं की हर मुराद पूरी होती है. वैसे तो यहां सालों भर श्रद्धालुओं का आना लगा रहता है, लेकिन […]

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हाजीपुर/महुआ : जिले की प्रसिद्ध शक्तिपीठ गोबिंदपुर सिंघाड़ा वाली मइया की पूजा पिछले चार सौ वर्षों से धूमधाम से पूजा करने की परंपरा चली आ रही है. मइया के दरबार में सच्चे मन से आने वाले श्रद्धालुओं की हर मुराद पूरी होती है. वैसे तो यहां सालों भर श्रद्धालुओं का आना लगा रहता है, लेकिन चैत्र व शारदीय नवरात्र में मइया के दरबार की रौनक देखते ही बनती है.

सबसे खास बात यह है कि यहां सदियों से मां की एक ही प्रकार की मूर्ति का निर्माण कर उसकी पूजा-अर्चना की जाती है. मूर्ति का निर्माण भी यहां जलालपुर गंगटी के बैजू पंडित के परिवार के लोग ही करते आये हैं.
कहा जाता है कि चार सौ वर्ष पूर्व स्थानीय राधाजीवन सिंह के पूर्वजों को मां ने स्वप्न में घर के समीप खाली पड़ी जमीन पर उनकी पूजा-अर्चना करने को कहा था. उसी वक्त से वहां मां की झोपड़ीनुमा मंदिर बना कर उनकी पूजा-अर्चना शुरू की गयी. धीरे-धीरे मां के इस मंदिर की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गयी. यहां बड़ी संख्या में भक्त आने लगें. गुजरते वक्त के साथ यहां मां का भव्य मंदिर बन गया.
आज यहां वैशाली जिले के अलावा आस पड़ोस के जिले से भी श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं. यहां नवरात्र के पांचवे दिन पंचमी को ही माता रानी का पट दो बकड़ो की बलि के साथ भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिया जाता है. नेत्र संस्कार के मौके पर पंचमी की शाम 5 बजे से देर रात्रि 12 बजे तक भक्तों की भीड़ से मंदिर परिसर गुलजार बना रहता है, और अगले दिन खष्टी से यहां बलि देने का सिलसिला शुरू हो जाता है.
शक्तिपीठ माता रानी का दरबार शक्तिपीठ के साथ साथ बलि प्रथा के लिए भी चर्चित है. यहां प्रत्येक वर्ष करीब 10 हजार से ज्यादा बकरों की बलि भी दी जाती है. बताया जाता है कि भक्तों द्वारा माता रानी से मांगी गयी मन्नतें पूरी होने के बाद भक्त यहां बकरों की बलि देकर तथा कबूतर छोड़कर पूजा पाठ की जाती है.
बलि के बाद बकरे का प्रसाद श्रद्धालु खुद भी ग्रहण करते हैं तथा अपने सगे-संबंधियों व पड़ोसियों के बीच भी वितरण करते हैं.
प्रशासनिक तौर पर उपेक्षित है यहां लगने वाला मेला
यहां नवरात्र में मां की पूजा-अर्चना के साथ पांच दिवसीय भव्य मेला का भी आयोजन किया जाता है. ग्रामीण सोहन सिंह, मोहन सिंह, प्रदीप कुमार सोनी, विजय राय, अभिषेक शुक्ला, वीरेंद्र कुमार सिंह, संजय सिंह, बलराम सिंह, सुनील कुमार सिंह आदि बताते हैं कि मां की पूजा-अर्चना के साथ-साथ बड़ी संख्या में लोग मेला घूमने भी आते हैं लेकिन प्रशासनिक स्तर पर न तो श्रद्धालुओं की सुविधा का ही ख्याल रखा जाता है और न ही सुरक्षा का.
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