ePaper

जागे जगत के पालक देवता, अब गुंजेगी शादी की शहनाई

Updated at : 01 Nov 2025 6:10 PM (IST)
विज्ञापन
जागे जगत के पालक देवता, अब गुंजेगी शादी की शहनाई

आंगन में अरिपन देकर की गयी पूजा अर्चना

विज्ञापन

– आंगन में अरिपन देकर की गयी पूजा अर्चना – अरिपन पर उकेरी गयी थी कृषि यंत्र की आकृति सुपौल धर्म शास्त्रों के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाने वाला श्री हरि प्रबोधिनी यानी देवोत्थान एकादशी शनिवार को धूमधाम से मनाया गया. देवोत्थान एकादशी के साथ ही सभी प्रकार के शुभ लग्न शुरू हो गये. इस पर्व के विधि-विधान एवं कथा के बारे में आचार्य पंडित धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि देवोत्थान एकादशी के दिन किसी भी जातक द्वारा पूर्ण निष्ठा एवं विधि विधान से व्रत एवं उपवास कर पूजा करने से 100 अश्वमेध यज्ञ और 100 राजसूर्य यज्ञ के बराबर फलों की प्राप्ति होती है. आषाढ़ शुक्ल पक्ष के एकादशी को शंखासुर नामक राक्षस का संहार कर भगवान विष्णु चार मास के लिए क्षीरसागर में सोने चले गए थे. उसी दिन से कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी यानी देवोत्थान एकादशी के दिन देवताओं को जगाए जाने का विधान है. बताया कि धर्म शास्त्रों में इस पर्व का विशेष महत्व बताया गया है. भगवान विष्णु को धरती पर सभी जीवों का पालक बताया गया है. उनके विभिन्न रूप हैं और हर रूप का अपना अलग-अलग महत्व है. इसी में एक शालिग्राम रूप की इस दिन पूजा अर्चना की जाती है. हिन्दु धर्म ग्रंथ के अनुसार इसी दिन से यज्ञ, विवाह मुहूर्त, उपनयन सहित सभी प्रकार के धार्मिक व मांगलिक कार्यों की शुरुआत की जाती है. भगवान का जागरण विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना के साथ किया गया. व्रत रखकर संध्या काल जगत के पालक देवता का जागरण किया गया. उन्हें नये वस्त्र अर्पित किये गये. इसके लिए बीच आंगन में अरिपन डालकर उस पर पूजा की चौकी रखी गयी. ईख या खरही से उसे मंडप का स्वरूप प्रदान किया गया. इसके पश्चात विधि पूर्वक पूजन शुरू किया गया. अंत में चौकी को चार लोग मिलकर मंत्रोच्चारण करते हुए अपने सिर से उपर तक तीन बार उठाया गया. इस अवसर पर महिलाएं भगवती का गोसाउनिक घर में आवाहन की. अरिपन पर कृषि यंत्र की आकृति उकेरी गयी थी. साथ ही बीच-बीच में विभिन्न अन्न का भंडार भरा गया था. तुलसी विवाह की भी है परंपरा आचार्य ने बताया कि प्रातः काल में स्नान करके शंखनाद, ढोल-नगाड़े के साथ वेद मंत्रोचारण कर नृत्य भजन कीर्तन कर देवेश्वर श्री विष्णु को निंद्रा से जगा कर उनकी पूजा अर्चना की गयी. इस एकादशी को परम पुण्य माना जाता है. शाम के समय आंगन में लगे तुलसी के पौधे के पास गन्ने का मंडप बनाकर नारायण स्वरुप शालिग्राम की मूर्ति की स्थापना करने एवं उनकी शादी संपन्न करने से परमधाम की प्राप्ति होती है. बिना तुलसी दल के पूजा से विष्णु का पूजन अधूरा माना जाता है. हिंदू धर्म ग्रंथ के अनुसार इसी दिन से विवाह, यज्ञ, उपनयन सहित सभी प्रकार के धार्मिक और मांगलिक कार्यों की शुरुआत की जाती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

विज्ञापन
RAJEEV KUMAR JHA

लेखक के बारे में

By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन