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एक दिन में एक टन माछ खा जाते हैं सुपौलवासी

Updated at : 02 Nov 2025 7:28 PM (IST)
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एक दिन में एक टन माछ खा जाते हैं सुपौलवासी

देसी माछ की जगह अब फॉर्मी माछ ने जमाया कब्जा

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– मिथिलांचल में अब थाली से गायब होने लगी मिथिला की पहचान देसी माछ – देसी माछ की जगह अब फॉर्मी माछ ने जमाया कब्जा अशोक, सुपौल पग-पग पोखर माछ मखान, सरस बोल मुस्की मुख पान यही है मिथिला की पहचान, लेकिन आधुनिकता के इस युग में अब मिथिला के इस पहचान से देसी माछ विलुप्त हो रही है. बाजार में फॉर्मी माछ का कब्जा हो गया है, जिसका सेवन करते लोग अब फॉर्मी माछ के आदि हो चुके हैं. यह फॉर्मी माछ शहर से लेकर गांव के बाजार में हर दिन मिल रहा है. एक आध जगह हाट में देसी माछ दिखता है भी उसके कई खरीदार सामने आ जा रहे हैं, जिससे देसी माछ की कीमत देखते ही देखते दोगुनी हो जाती है. 10 से 15 क्विंटल लोकल मछली की होती है बिक्री सुपौल वासी मछली के बहुत शौकीन हैं. लिहाजा शहरवासी प्रतिदिन एक टन मछली खा जाते हैं. शहर के गुदरी बाजार, हुसैन चौक, झखराही ढाला, ब्रहम स्थान चौक एवं लोहियानगर ढाला के समीप मछली का हाट प्रतिदिन लगता है. जानकार बताते हैं कि इन सभी स्थानों से शहर में प्रतिदिन एक टन मछली की बिक्री होती है, जिसमें लोकल मछली की मात्रा करीब 10 से 15 क्विंटल ही होती है. शेष मछली बंगाल से आती है. लोकल पोखर में मिलता है रेहु, कमलकांट, कतला व बिग्रेड माछ मछली व्यवसाय से जुड़े लोगों ने बताया कि स्थानीय पोखर में रेहू, कमलकांट, कतला व ब्रिगेड मछली का पालन होता है. जो जल्दी विकास करती है. लिहाजा पोखर मालिक इन मछली को पालने में दिलचस्पी दिखाते हैं. बताया कि लोकल मछली खाने में बहुत स्वादिष्ट होती है. जिसका डिमांड काफी अधिक होता है. जिस कारण स्थानीय पोखर में मछली को बड़ा होने नहीं दिया जाता है. ढाई सौ ग्राम से लेकर साढे सात सौ ग्राम तक वजन होने पर ही मछली का माही कर लिया जाता है. जिस कारण इस प्रकार के बड़ी मछली बाजार में नहीं रहता है. बंगाल से लाये गये मछली का साइज व वजन अधिक होता है. यह अमूमन एक किलो से लेकर तीन किलो तक के वजन का होता है. जिसे लोकल मछली कहकर बेचा जाता है. यह मछली बाजार में 250 से 350 रुपए प्रति किलो बिकता है. मनमाने दाम पर बिकता है जंगली माछ इलाके में चर चांचर के विलुप्त होने के कारण जंगली यानि देसी माछ बहुत कम मिलता है. यदि कोई मछुआरा देसी माछ लेकर हाट आते हैं तो आधे से अधिक उनका मछली रास्ते में ही बिक जाता है. शेष बचे माछ हाट पर लाते है बिक जाता है. ऐसे में मछुआरा मछली के शौकीन से मनमाफिक दाम वसूल करते हैं. विलुप्त होने के कगार पर है मारा माछ मिथिला में मारा माछ के शौकीन बहुत लोग हैं. इस माछ को राजा महाराजा का पसंद बताया जाता है. यह खाने में बंगाल की प्रसिद्ध मछली इलिस से भी ज्यादा स्वादिष्ट होती है. सबसे बड़ी बात इस मछली में ओमेगा थ्री की प्रचुर मात्रा पायी जाती है. जो स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक होता है. खासकर शुगर व बीपी के मरीज के लिए यह मछली सेहतमंद होती है. ये है मिथिला की स्वादिष्ट मछली यूं तो मिथिला के नदी, नाले, चर, चॉप, चांचर व पोखर में कई किस्म में देसी मछली पाये जाते हैं, लेकिन अति लोभ की वजह से मछली के शौकीन व मछुआरे इन पानी के स्रोत में जहर डाल देते हैं. जिस कारण स्वादिष्ट छोटी मछली विलुप्ति के कगार पर है. हर प्रकार की छोटी मछली स्वादिष्ट होती है. लेकिन इनमें रेवा, पिहरा, कबै, टेंगरा, सिंही, मुंगरी, बचवा, इचना, बामी, चेचरा, गरे, गरचुनी, पोठी, दरही, सौराठी, लटा, कौवा, पटैया, बुआरी व नैनी अधिक स्वादिष्ट होता है. सरसों के छोड़ व लहसून व प्याज के पेस्ट के साथ बनाये जाने वाले यह मछली अत्यंत स्वादिष्ट होता है. आठ सौ रुपए किलो बिकती है मुंगरी मछली हाट में देसी मछली के गायब हो जाने के कारण इन मछलियों का दाम आसमान पर होता है. देसी मुंगरी व देसी सिंही की कीमत सात सौ से आठ सौ रुपये किलो बिकती है. जबकि यही दर बड़े साइज के कबै का भी होती है. जबकि विलुप्त हो चुके टेंगरा, चेचरा, इचना, बामी, दरही, बचवा की कीमत भी 500 से 600 से रुपये प्रति किलो है. कभी प्रमुख व्यंजन में शामिल होता था मरूआ की रोटी व पोठी की चटनी बीते दो दशक पूर्व मिथिलांचल के प्रमुख खाद्य व्यंजन में मरूआ की रोटी व पोठी माछ शामिल था. नॉन वेजिटेरियन लोगों में शामिल मछली के शौकीन ने नाश्ते में मरूआ की रोटी व पके पोठी माछ का व्यंजन जरूर होता था. अब इलाके में ना ही मरूआ की खेती होती है, ना ही पोठी माछ की मिल पाता है. कोसी नदी से भी विलुप्त हो गया भूना इलाके के प्रसिद्ध मछली में शुमार भूना मछली कोसी नदी में प्रचुर मात्रा में मिलती थी. लेकिन अब यह मछली कोसी से विलुप्त हो गयी है. इलाके में कहा जाता था कि सड़लो (सरा हुआ) भूना तो रेहू का दूना. यानि सड़ा हुआ भूना का स्वाद रेहू मछली से ज्यादा स्वादिष्ट होता था.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAJEEV KUMAR JHA

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By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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