रक्षाबंधन आज, राखियों की खुशबू से महका बाजार

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सुबह 7:05 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक है शुभ मुहूर्त

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सुबह 7:05 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक है शुभ मुहूर्त सुपौल.रक्षाबंधन के पावन पर्व पर बाजार में रौनक देखते ही बन रही है. सुबह से ही राखी, मिठाई और उपहार की दुकानों पर भीड़ उमड़ पड़ी. रंग-बिरंगी राखियों की चमक और मिठाइयों की खुशबू ने पूरे बाजार को त्योहार के रंग में रंग दिया. बहनों ने अपने भाइयों की कलाई सजाने के लिए खास राखियों की खरीदारी की, वहीं छोटे बच्चों में कार्टून और चमकीली राखियों का क्रेज साफ दिखा. मिठाई की दुकानों पर गुलाबजामुन, रसगुल्ला और काजू कतली की बिक्री चरम पर रही. त्योहार की इस चहल-पहल के बीच, कई भाई-बहन दूरियों के बावजूद मिलने पहुंचे, जिससे बाजार में मिलन के भावनात्मक दृश्य भी देखने को मिले. शहर की गलियों में केवल एक ही धुन गूंजती रही राखी का बंधन, प्यार का जीवन. रक्षाबंधन पर आयुष्मान योग, बहनें भाई की कलाई पर बांधेंगी शुभ राखी : आचार्य धर्मेंद्र भाई-बहन के पवित्र प्रेम और अटूट विश्वास का प्रतीक रक्षाबंधन पर्व इस बार शनिवार को पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा. इस वर्ष रक्षाबंधन श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयुष्मान योग में मनाया जाएगा, जो इसे और भी अधिक शुभ और फलदायी बनाता है. राखी बांधने का शुभ मुहूर्त पंडित आचार्य धर्मेंद्र नाथ मिश्र के अनुसार, राखी बांधने का उत्तम समय प्रातः 7:05 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक है. पूर्णिमा तिथि दोपहर 01 बजकर 33 मिनट तक रहेगी. इस दौरान बहनें अपने भाइयों को टीका, चंदन, आरती के साथ विधिवत राखी बांधेंगी और उनके दीर्घायु व समृद्ध जीवन की कामना करेंगी. रक्षा सूत्र बांधते समय उच्चारित किया जाने वाला मंत्र पंडित श्री मिश्र ने बताया कि येन बद्धो बली राजा, दानवेंद्रो महाबलः, तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे मा चल मा चल है. इस दिन को धार्मिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत विशेष माना जाता है. भगवान विष्णु ने इसी दिन हयग्रीव अवतार लेकर अधर्म का नाश किया था. साथ ही ऋषि याज्ञवल्क्य की जयंती भी इसी दिन मनाई जाती है. पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि महाभारत काल में जब भगवान श्रीकृष्ण की उंगली कट गई थी, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांधा था. इसे ही रक्षाबंधन की भावना का प्रारंभ माना जाता है. बाद में जब द्रौपदी का चीर हरण हुआ, तो श्रीकृष्ण ने उसी प्रेम और ऋण को निभाते हुए उनकी लाज बचाई. देवलोक से धरती तक रक्षाबंधन का परिवर्तन पौराणिक मान्यता है कि रक्षाबंधन का आरंभ देवलोक में हुआ, जहां इंद्राणी ने अपने पति इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था. वहीं से यह परंपरा धरती पर आई, लेकिन यहां यह परंपरा बहन द्वारा भाई को राखी बांधने के रूप में विकसित हुई. समाज सुधार का प्रतीक रक्षाबंधन सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि समाज में सद्भाव, सुरक्षा, सम्मान और स्त्री-पुरुष संबंधों में पवित्रता की भावना को मजबूती देने वाला पर्व है. इस दिन बांधा गया रक्षा सूत्र न केवल भाई को बहन की रक्षा की प्रेरणा देता है, बल्कि एक दिव्य मंत्र शक्ति के रूप में ईश्वर की कृपा को भी आकर्षित करता है.

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RAJEEV KUMAR JHA

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