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नवविवाहिताओं के लिए महत्वपूर्ण पर्व है मधुश्रावणी : आचार्य धर्मेंद्रनाथ

मधुश्रावणी पर्व मिथिलांचल की अनेक सांस्कृतिक विशेषताओं में एक है

करजाईन. श्रावण मास के आते ही मिथिलांचल में विभिन्न प्रकार के पर्व त्योहारों का दौर शुरू हो जाता है. विशेषकर स्त्री वर्ग एवं नवविवाहिता के लिए महत्वपूर्ण लोक पर्व मधुश्रावणी जो नव दंपतियों के लिए अखंड सौभाग्य को प्रदान करती है. मधुश्रावणी पर्व मिथिलांचल की अनेक सांस्कृतिक विशेषताओं में एक है. पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि इस त्योहार को नवविवाहिता काफी आस्था और उल्लास के साथ मनाते हैं. मिथिलांचल में नवविवाहिता द्वारा यह व्रत अपने सुहाग की रक्षा एवं गृहस्थ धर्म में मर्यादा के साथ जीवन निर्वाह के उद्देश्य से रखा जाता है. वैदिक काल से ही मिथिलांचल में ऐसी मान्यता है कि, पवित्र श्रावण मास में निष्ठा पूर्वक नागदेवता की पूजन आराधना करने से दंपति की जीवन की आयु लंबी होती है. नाग पंचमी से शुरू होकर 15 दिनों तक चलने वाला यह व्रत पूजन टेमी के साथ विश्राम होता है. गुरुवार 25 जुलाई से 07 अगस्त तक चलने वाले इस पर्व को लेकर बुधवार को बाजार में खरीदारों की भीड़ लगी रही. इस पर्व में गौरीशंकर की पूजा तो होती ही है, साथ साथ विषहरी और नागिन की भी पूजा होती है. इस पूजन में नवविवाहिता अनेक प्रकार के फूल, फूल पत्ते एकत्र कर पूजन करती हैं. प्रथा तो यहां तक है कि इन दिनों नवविवाहिता के ससुराल से आए हुए कपड़े गहने ही पहनती हैं, और भोजन आदि भी वहीं से आए हुए अन्न का करती हैं. इसलिए पूजा शुरु होने के 01 दिन पूर्व ही नवविवाहिताओं के ससुराल से समस्त सामग्री भेज दी जाती है. प्रथम और अंतिम दिन की पूजा बड़े विस्तार से होती है. भूमि पर पीठार और सिंदूर आदि का अल्पना, रंगोली आदि बनाकर ढेर सारे फूल पत्तियों से पूजा की जाती है. पूजा उपरांत विशिष्ट ज्ञानी महिलाओं द्वारा कथा सुनाई जाती है, जिसमें शंकर पार्वती के चरित्र के माध्यम से पति-पत्नी के बीच होने वाली बातें, नोकझोंक, रूठना मनाना, प्यार दुलार, इत्यादि की कथा सुनाई जाती है ताकि नवदंपति इन परिस्थितियों में एवं उनके साथ सुखमय जीवन यापन कर सकें. यह मानकर कि यह सब दांपत्य जीवन के स्वाभाविक लक्षण हैं. पूजा के अंत में नवविवाहित सभी सुहागिनों को अपने हाथों से खीर का प्रसाद एवं पीसी हुई मेहंदी बांटती हैं. अंतिम दिवस नव विवाहिता के अंगों को चार स्थानों पर दोनों घुटनों को जलती हुई दीया यानी टेमी से दागा जाता है. जिससे चार पुरुषार्थ या चार प्रकार के फल धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति सुलभता से हो सके और जीवन में सहनशील बनने बनाने के लिए भी योगदान समुचित है.

टेमी से दागने की है प्रथा

अंतिम दिवस नवविवाहिता के अंगों को चार स्थानों पर दोनों पैर एवं घुटनों को जलते हुए दिए की बाती यानी टेमी से दागा जाता है. जिससे चार पुरुषार्थ या चार प्रकार के फल धर्म अर्थ काम एवं मोक्ष की प्राप्ति सुलभता से हो सके तथा जीवन में सहनशील बनाने के लिए भी यह विधान समुचित है.

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Prabhat Khabar News Desk
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