ePaper

पांच दिवसीय झूलन महोत्सव आज से, तैयारी पूरी

Updated at : 05 Aug 2025 6:23 PM (IST)
विज्ञापन
पांच दिवसीय झूलन महोत्सव आज से, तैयारी पूरी

अस्त होती जा रही जा रही सुपौल में झूलनोत्सव की परंपरा, मेले की रौनक अब फीकी

विज्ञापन

अस्त होती जा रही जा रही सुपौल में झूलनोत्सव की परंपरा, मेले की रौनक अब फीकी सुपौल. एक समय था जब सावन के महीने में सुपौल शहर झूलनोत्सव की भव्यता से जगमगा उठता था. पूरे शहर में धार्मिक उत्सव का माहौल रहता था, जगह-जगह भगवान श्रीकृष्ण के झूले सजते थे और सड़कों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती थी. स्टेशन चौक, राधाकृष्ण ठाकुरबाड़ी, गुदरी बाजार, थाना चौक, लोहियानगर, कीर्तन भवन और बाल समाज जैसे प्रमुख स्थलों पर झूलनोत्सव विशेष रूप से धूमधाम से मनाया जाता था. गिरधारी को प्रिय था झूला मान्यता है कि सावन में जब गोपियां झूला झूलती थीं, तो भगवान श्रीकृष्ण स्वयं भी उनके संग झूला झूलते थे. इसी परंपरा को जीवित रखते हुए भक्तजन आज भी भगवान को झूले पर विराजमान कर उन्हें झुलाते हैं. वृंदावन की तर्ज पर सुपौल में भी सावन शुक्ल पक्ष में 5 से 15 दिनों तक झूले लगाए जाते हैं. यहां अब भी भगवान को पांच दिनों तक पालने में झुलाने की परंपरा निभाई जाती है. वक्त के साथ बदल गया मंजर करीब एक दशक पहले तक झूलनोत्सव के दौरान शहर के स्टेशन चौक से महावीर चौक की आधा किलोमीटर की दूरी तय करने में लोगों को तीन घंटे तक लग जाते थे. चारों ओर भजन संध्या, सांस्कृतिक कार्यक्रम, झांकियां और धार्मिक आयोजन की रौनक रहती थी. परंतु समय के साथ झूलनोत्सव की वह चकाचौंध अब मद्धम पड़ गई है. अब मेले की जगह सड़कों के किनारे ठेले और दुकानें अधिक नजर आती हैं. आयोजनों की संख्या कम हुई है और श्रद्धालुओं की भीड़ भी पहले जैसी नहीं रही. स्थिति यह है कि झूलन का मेला केवल औपचारिकता बनकर रह गया है. संस्कृति को जीवित रखने की चुनौती झूलनोत्सव जैसी पारंपरिक और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखना अब चुनौती बनती जा रही है. धार्मिक समितियां और स्थानीय लोग अब भी इसे सहेजने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन व्यापक जनसहयोग और प्रशासनिक समर्थन के अभाव में यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही है. भगवान श्री कृष्ण के शाश्वत यज्ञ है झूलन : आचार्य धर्मेंद्र आज से पांच दिवसीय झूलन महोत्सव की भव्य शुरुआत हो गई. श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाने वाला यह उत्सव श्रावणी पूर्णिमा तक चलेगा. आचार्य धर्मेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के प्रेम और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है. मान्यता है कि वर्षा ऋतु के आगमन पर राधा-कृष्ण प्रेम में झूला झूलते थे, जिसे भक्त आज भी हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाते हैं. महोत्सव के पहले दिन ही मंदिरों और घरों में भगवान के झूलों को भव्य रूप से सजाया गया. कहीं लकड़ी के, तो कहीं सोने-चांदी से बने झूले को फूल-मालाओं और रंग-बिरंगी सजावट से अलंकृत किया गया. भगवान की मूर्तियों को झूले पर विराजमान कर भक्तों ने भजन-कीर्तन और नृत्य के माध्यम से राधा-कृष्ण की भक्ति में सराबोर वातावरण बना दिया. यह उत्सव सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्तों के लिए भक्ति और प्रेम का जीवंत उत्सव है. भागवत महापुराण और अन्य पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब वृंदावन में वर्षा ऋतु आती थी, तब गोपियां भगवान के पुनर्मिलन की खुशी में झूला बनाकर राधा रानी को उसमें बैठाती थीं और सभी मिलकर भजन गाते हुए झूला झुलाती थी. वनों में मोर और चिड़ियों की कलरव तथा वर्षा की फुहारों के बीच राधा-कृष्ण का यह झूला उत्सव उस दिव्य प्रेम को दर्शाता है, जो आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है. यही कारण है कि वृंदावन समेत पूरे देश में यह महोत्सव अत्यंत श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

विज्ञापन
RAJEEV KUMAR JHA

लेखक के बारे में

By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन