बक्सर का बेटा बना अधिकारी, बचपन में ही माता-पिता का छूटा साथ, जानिए संघर्ष से सफलता की कहानी

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बक्सर के भंजन कुमार

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BPSC Success Story : बक्सर के प्रभंजन कुमार चौबे न कठिन परिस्थितियों में हासिल की बड़ी सफलता. बिना कोचिंग सिर्फ सेल्फ स्टडी से BPSC में 192वीं रैंक पाई. नौकरी छोड़कर चुना संघर्ष का रास्ता, बने जिला शिक्षा पदाधिकारी. उनकी कहानी युवाओं के लिए प्रेरणा और हौसले की मिसाल बनी.

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बक्सर(राजपुर) से पंकज कमल की रिपोर्ट
BPSC Success Story :
कभी-कभी जिंदगी इतनी कठिन परीक्षा लेती है कि मजबूत से मजबूत इंसान भी टूट जाए लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उन्हीं मुश्किलों को अपनी ताकत बना लेते हैं. चौसा प्रखंड के तिवाय गांव के प्रभंजन कुमार चौबे की कहानी भी कुछ ऐसी ही है-दर्द, संघर्ष और हौसले से लिखी गई एक प्रेरणादायक दास्तान.

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बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ गया. एक ऐसा खालीपन, जिसे कोई भर नहीं सकता लेकिन जिंदगी रुकती नहीं. छोटे से प्रभंजन के सामने अंधेरा जरूर था, पर उनके भीतर एक रोशनी भी थी-कुछ कर दिखाने की. इस मुश्किल समय में उनके बड़े भाई रामनिवास चौबे और भाभी रूबी कुमारी उनके लिए सिर्फ सहारा नहीं, बल्कि माता-पिता बनकर खड़े रहे. उन्होंने कभी प्रभंजन को यह महसूस नहीं होने दिया कि उनके सिर पर किसी का हाथ नहीं है. गरीबी, जिम्मेदारियां और भावनात्मक संघर्ष-इन सबके बीच प्रभंजन ने पढ़ाई को ही अपना रास्ता बनाया. दिन-रात की मेहनत, आत्मविश्वास और अपने परिवार के सपनों को सच करने की जिद ने उन्हें आगे बढ़ाया.

सपनों के लिए छोड़ी नौकरी, चुना संघर्ष का रास्ता

प्रभंजन शुरू से ही पढ़ाई में तेज थे. 2016 में पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर से स्नातक और फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमएससी की पढ़ाई पूरी की. 2018 में प्रतिष्ठित विप्रो कंपनी में नौकरी मिली-एक सुरक्षित भविष्य उनके सामने था. लेकिन दिल में एक और सपना था-समाज के लिए कुछ करने का, अपनी पहचान बनाने का. यही सपना उन्हें चैन से बैठने नहीं देता था. आखिरकार 2020 में उन्होंने वह फैसला लिया, जो आसान नहीं था-उन्होंने नौकरी छोड़ दी. एक तरफ पक्की नौकरी, दूसरी तरफ अनिश्चित भविष्य लेकिन प्रभंजन ने अपने सपनों पर भरोसा किय

बिना कोचिंग, सिर्फ खुद पर भरोसा

आज के समय में जहां प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महंगी कोचिंग आम बात है, वहीं प्रभंजन के पास सीमित संसाधन थे. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने ‘सेल्फ स्टडी’ को अपना हथियार बनाया। घर के एक कोने में बैठकर, किताबों को अपना साथी बनाकर, उन्होंने दिन-रात मेहनत की. हर असफलता का डर, हर चुनौती-सबको पीछे छोड़ते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य पर नजर टिकाए रखी. और आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई. बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की परीक्षा में उन्होंने 192वीं रैंक हासिल की और जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) बन गए.

खुशी के आंसुओं में डूबा गांव

जब यह खबर तिवाय गांव पहुंची, तो मानो हर घर में खुशी का दीप जल उठा. जिन आंखों ने उन्हें संघर्ष करते देखा था, आज उन्हीं आंखों में गर्व और खुशी के आंसू थे. बहनें, परिवारजन और गांव के लोग मिठाइयां बांटते नजर आए.

प्रभंजन की सफलता सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि यह उन तमाम युवाओं के लिए संदेश है-
अगर इरादे मजबूत हों, तो हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, मंजिल जरूर मिलती है. उनकी कहानी यह साबित करती है कि किस्मत नहीं, मेहनत और हौसला इंसान को ऊंचाइयों तक पहुंचाता है.

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