नए डिग्री कॉलेजों में उर्दू विषय की उपेक्षा पर शिक्षाविदों में आक्रोश, पुनर्विचार की मांग

Published by : Rajeev Kumar Updated At : 07 Jun 2026 6:02 PM

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बैठक कर विचार करते नजुल होदा व अन्य.

Saran News : जदयू के प्रदेश उपाध्यक्ष नजमुल होदा ने कहा कि  नए डिग्री कॉलेजों में शिक्षण के लिए स्वीकृत 16 विषयों में उर्दू को शामिल नहीं किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है.

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छपरा से विकास कुमार की रिपोर्ट

Saran News :  बिहार सरकार द्वारा राज्य के विभिन्न प्रखंडों में हाल ही में स्थापित 208 डिग्री कॉलेजों में उर्दू विषय को शामिल नहीं किए जाने पर उर्दू भाषी समाज, शिक्षाविदों एवं बुद्धिजीवियों ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है. इस मुद्दे को लेकर छपरा के सर्किट हाउस में उर्दू भाषा से जुड़े विद्वानों, शिक्षकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई.

बैठक की अध्यक्षता जनता दल (यूनाइटेड) के प्रदेश उपाध्यक्ष नजमुल होदा ने की. उन्होंने कहा कि बिहार में उर्दू को दूसरी राजभाषा का संवैधानिक दर्जा प्राप्त है, इसके बावजूद नए डिग्री कॉलेजों में शिक्षण के लिए स्वीकृत 16 विषयों में उर्दू को शामिल नहीं किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है.

उर्दू को भी शिक्षण विषयों की सूची में शामिल करें

नजमुल होदा ने कहा कि राज्य के हजारों छात्र-छात्राएं उर्दू विषय में उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन सरकार के इस निर्णय से उनके शैक्षणिक अवसर सीमित हो सकते हैं. उन्होंने बिहार सरकार से इस निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए उर्दू को भी शिक्षण विषयों की सूची में शामिल करने की मांग की.

राज्यपाल को भेजा जाएगा ज्ञापन

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि सरकार द्वारा फिलहाल 16 विषयों में अध्ययन-अध्यापन की अनुमति दी गई है, लेकिन उर्दू जैसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक विषय को सूची से बाहर रखना कई सवाल खड़े करता है. वक्ताओं ने मांग की कि उर्दू को 17वें विषय के रूप में शामिल किया जाए.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सैयद मोहम्मद समीउज जमा ने कहा कि इस संबंध में एक विस्तृत ज्ञापन तैयार किया गया है, जिसे बिहार सरकार और राज्यपाल को भेजा जाएगा. ज्ञापन में नए डिग्री कॉलेजों के पाठ्यक्रम में उर्दू को शामिल कर उर्दू भाषी विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करने की मांग की जाएगी.

वक्ताओं ने जताई चिंता

बैठक में डॉ. एस.एम. मुश्ताक, डॉ. एहतेशाम अहमद, मतीन आलम सहित अन्य वक्ताओं ने अपने विचार रखते हुए उर्दू विषय की अनदेखी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उर्दू को शिक्षा व्यवस्था से दूर रखना न केवल भाषा के विकास को प्रभावित करेगा, बल्कि यह सामाजिक समावेशिता की भावना के भी विपरीत है.

पाठ्यक्रम में उचित स्थान मिलना चाहिए

वक्ताओं ने कहा कि राज्य की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के लिए उर्दू जैसी भाषाओं को शिक्षा के मुख्यधारा पाठ्यक्रम में उचित स्थान मिलना चाहिए.

बैठक में वसीम अकरम, इरफान अहमद, फैजान आलम, इकराम खान, एम.एम. हसन, मुहम्मद अजहर, अशरफ अली सहित बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और उर्दू प्रेमी उपस्थित थे.

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