अब तक नहीं बन पाया पर्यवेक्षण गृह व बाल गृह

Published at :14 Dec 2015 6:26 PM (IST)
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अब तक नहीं बन पाया पर्यवेक्षण गृह व बाल गृह

अब तक नहीं बन पाया पर्यवेक्षण गृह व बाल गृह 2.67 करोड़ की लागत से बननेवाले इन गृहों के निर्माण के लिए आठ वर्ष पूर्व मिले थे रुपये स्थल चयन व निर्माण कार्य फाइलों में लटकाने के बाद भवन निर्माण विभाग ने 45 लाख रुपये लौटाये किराये के अनुपयुक्त भवनों में रहने को विवश हैं […]

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अब तक नहीं बन पाया पर्यवेक्षण गृह व बाल गृह 2.67 करोड़ की लागत से बननेवाले इन गृहों के निर्माण के लिए आठ वर्ष पूर्व मिले थे रुपये स्थल चयन व निर्माण कार्य फाइलों में लटकाने के बाद भवन निर्माण विभाग ने 45 लाख रुपये लौटाये किराये के अनुपयुक्त भवनों में रहने को विवश हैं बाल आवासी, भूले- भटके व अनाथ बच्चे नोट: फोटो नंबर 14 सी.एच.पी 1 है कैप्सन होगा- रेडक्रास सोसाइटी के किराये के कमरे में चलता पर्यवेक्षण गृह संवाददाता, छपरा (सदर). बच्चों के अधिकार के लिए संघर्ष करनेवाले देश के बाल कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार गत वर्ष मिला. परंतु, यहां तो बच्चों के अधिकारों का हनन करने से पदाधिकारी जरा भी नहीं कतराते. इसकी वजह से भवन निर्माण विभाग की कारगुजारी व जिला प्रशासन की उदासीनता के कारण जिला स्कूल पर्यवेक्षण गृह तथा बाल गृह के कम-से-कम आठ दर्जन बच्चे किराये के अनुपयुक्त कमरों में रहने को विवश हैं. ऐसी स्थिति में उनके बालपन में मिलनेवाली बुनियादी जरूरतों का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है. अंतत: सात वर्षों के बाद इन बच्चों के लिए बेहतर आवास निर्माण के लिए मिली 45 लाख रुपये की राशि चयनित स्थल उपयुक्त नहीं होने का बहाना बना कर लौटा दिया गया. आखिर आठ वर्षों तक संबंधित पदाधिकारियों ने बच्चों की बुनियादी जरूरत से संबंधित सुविधा का हनन किया, जो निश्चित तौर पर उन्हें बाल अधिकार से वंचित करता है. 2.67 करोड़ की लागत से बनना था पर्यवेक्षण गृह व बाल गृह समाज कल्याण विभाग के निर्देशानुसार पर्यवेक्षण गृह में रहनेवाले विभिन्न आपराधिक मुकदमों में पकड़ कर लाये गये बाल आवासी तथा विभिन्न भूले- भटके व अनाथ नाबालिग लड़कों की बेहतर अावासीय सुविधा के लिए 50 बेडों का पर्यवेक्षण गृह 1 करोड़ 10 लाख 19,400 की लागत से, 25 बेड का बाल गृह, 91 लाख 15 हजार की लागत से, अधीक्षक का कार्यालय 15 लाख 9 हजार की लागत से तथा कर्मचारी आवास 17 लाख 8 हजार रुपये की लागत से व गार्ड रूम 1 लाख 49 हजार 500 रुपये की लागत से निर्माण करना था. वित्तीय वर्ष 07-08 में मिली राशि लौटायी गयी समाज कल्याण विभाग की योजना के कार्यान्वयन के वित्तीय 07-08 में विभाग से 45 लाख रुपये प्रथम किस्त के रूप में मिले. वहीं इस संबंध में भवण प्रमंडल, छपरा के तत्कालीन कार्यपालक अभियंता ने जिला पदाधिकारी को सूचित किया कि 18 मार्च, 2008 को इन गृहों के निर्माण के लिए स्थल चयन तथा कार्य प्रारंभ करने की अनुमति दी गयी. यही नहीं विभाग ने साइड प्लान, नक्शा आदि का अनुमोदन भी कराने के साथ-साथ विषयगत कार्य की मिट्टी जांच करायी. परंतु, एकरारनामा होने के बाद भी विभागीय दावं-पेच में योजना फंसी रही तथा पर्यवेक्षण गृह व बाल गृह के बच्चे बुनियादी सुविधा के लिए जूझते रहे. पहले कार्य शुरू होने की दी रिपोर्ट, फिर कहा कि चयनित स्थल उपयुक्त नहींसमाज कल्याण विभाग द्वारा 12वें वित्त आयोग की अनुशंसा एवं राज्य योजना अंतर्गत राशि की स्वीकृति की गयी व राशि भी उपलब्ध करायी गयी. वहीं पटना उच्च न्यायलय के तत्कालीन न्यायमूर्ति बीएन सिन्हा की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया. जो भवन निर्माण के लिए अनुश्रवण की समीक्षा करें. वहीं इस दौरान भवन निर्माण के पदाधिकारियों ने सदर प्रखंड के विशुनपुरा में 12 सितंबर, 2012 को तथा उसके पहले भी स्थल चयन होने व निर्माण कार्य शुरू होने आदि से संबंधित रिपोर्ट देते रहे. वहीं बाद में जिस संवेदक से एकरारनामा हुआ था. कमोवेश भवन निर्माण विभाग कथित उदासीनता व लापरवाही के कारण योजना लटकी रही. वहीं 24 सितंबर, 2015 को जिलास्तरीय बैठक के बाद कार्यपालक अभियंता ने डीएम को दिये रिपोर्ट में इन गृहों के निर्माण के लिए चयनित स्थल को 20 से 25 फुट गहरा तालाब बताते हुए खारिज कर दिया कि उस स्थल पर मकान नहीं बन सकता है. अब दूसरी जमीन देखी जाये. आखिर इतने दिनों तक पदाधिकारी बच्चों के इन गृहों के निर्माण व स्थल चयन के प्रति क्योंं उदासीन बने थे यह चर्चा का विषय है. वहीं राशि लौट जाने को ले भी चर्चाएं है. पर्यवेक्षण गृह तथा बाल गृह का निर्माण नहीं होने के कारण किराये के अनुपयुक्त भवन में रहने वाले बाल आवासी व अनाथ, भूले भटके बच्चे परेशानी के बीच रहने को विवश है. भाष्कर प्रियदर्शी सहायक निदेशक जिला बाल संरक्षण इकाई, छपरा बाल गृह एवं पर्यवेक्षण गृह के लिए प्रथम किस्त में सात वर्ष पूर्व मिली राशि लौटा दी गयी है. इसकी वजह इन भवनों के निर्माण के लिए चयनित स्थल उपयुक्त नहीं था. स्थल चयन के बाद ही नये भवन की निर्माण की दिशा में कार्य होगा. रामाधार रामकार्यपालक अभियंता भवन प्रमंडल, छपरा

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