मन्नत पूरी हुई तो तोड़ दीं धर्म की बंदिशें

छपरा : धर्म के प्रति समर्पण और परंपराओं का निष्ठा पूर्वक निर्वहन करना इंसान के जीवन को सार्थक करता है. वहीं आस्था और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास जब धर्म की बंदिशों को तोड़ देता है तो वह इतिहास में एक उदाहरण बन जाता है. आस्था के प्रति समर्पित एक ऐसे ही व्यक्तित्व हैं छपरा […]
छपरा : धर्म के प्रति समर्पण और परंपराओं का निष्ठा पूर्वक निर्वहन करना इंसान के जीवन को सार्थक करता है. वहीं आस्था और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास जब धर्म की बंदिशों को तोड़ देता है तो वह इतिहास में एक उदाहरण बन जाता है. आस्था के प्रति समर्पित एक ऐसे ही व्यक्तित्व हैं छपरा के नई बाजार मोहल्ले में रहने वाले सैयद शकील हैदर. शकील 17 वर्षों से पूरे रीती रिवाज और मान्यताओं को ध्यान में रखकर छठ महापर्व करते आ रहे हैं.
1994 में इनकी शादी हुई और विगत 20 वर्षों से एलआइसी में काम कर रहे हैं. शादी के तीन-चार वर्षों तक संतान नहीं होने से मन में काफी निराश आयी. एक दिन शकील हैदर के एक मित्र विजय कुमार सिंह ने उन्हें छठ घाट आकार मन्नत मांगने की सलाह दी. उन्होंने सुबह के अर्घ्य के समय पत्नी के साथ जाकर संतान की कामना की और पूरा होने पर छठ करने का प्रण लिया. धर्म के बंधनों को तोड़ शकील हैदर ने जिस निष्ठा के साथ भगवान भास्कर से संतान की मन्नत मांगी वह पूरी हुई और घर में हंसता खेलता पुत्र आया.
शकील उनकी पत्नी और उनके मां-पिता के खुशी का ठिकाना न रहा. हालांकि अब शकील के लिये परीक्षा की घड़ी थी. समाज के कटाक्षों को घोंट कर उन्होंने निष्ठा पूर्वक छठ व्रत किया. इस दौरान शकील को उनके पिता और मां ने व्रत करने के लिये पूरा स्पोर्ट किया. हालांकि अपने समुदाय की छींटाकशी उन्हें झेलनी पड़ी. वैसे आज इनके मोहल्ले के लोग और रिश्तेदारों का मिजाज बदल चुका है. अब इनके नाते रिश्तेदार भी उत्साह के साथ छठ पूजा में शामिल होते हैं. शकील के मन्नत पूरा होने के बाद छठ की महिमा इनके सुमदाय में बढ़ने लगी और अब मोहल्ले के कई लोग इनके साथ व्रत करते हैं. प्रभात खबर से हुई बातचीत में शकील बताते हैं कि आस्था सबसे ऊंची है. उनका अपने धर्म में पहले के तरह ही लगाव और विश्वास है पर ईश्वर की महिमा ने उन्हें धर्म की बंदिशें तोड़ इस महापर्व में शामिल होने का अवसर दिया उसे यह अपना सौभाग्य मानते हैं. निश्चित ही शकील आज के समाज के लिये एक प्रेरणा बन चुके हैं.
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