छठपूजा के लिए कलसूप व दउरा बनाने में जुटे कारीगर

Updated at : 24 Oct 2017 2:20 AM (IST)
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छठपूजा के लिए कलसूप व दउरा बनाने में जुटे कारीगर

छपरा(नगर) : छठ महापर्व आते ही हर जगह श्रद्धा व भक्ति का माहौल नजर आने लगता है. आम से लेकर खास भी पर्व के दिनों में पूरी आस्था और निष्ठा के साथ सक्रिय हो जाते हैं. वहीं इस खास पर्व को और भी खास बनाते हैं कुछ ऐसे लोग जो इस महापर्व में लगने वाले […]

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छपरा(नगर) : छठ महापर्व आते ही हर जगह श्रद्धा व भक्ति का माहौल नजर आने लगता है. आम से लेकर खास भी पर्व के दिनों में पूरी आस्था और निष्ठा के साथ सक्रिय हो जाते हैं. वहीं इस खास पर्व को और भी खास बनाते हैं कुछ ऐसे लोग जो इस महापर्व में लगने वाले सामान को दिन-रात की मेहनत से बनाकर आमलोगों को उपलब्ध कराते हैं.

छपरा के पुलिस लाइन के पास सड़क किनारे रहने वाले कुछ गरीब परिवार के लोग विगत दो महीने से दिन-रात एक कर बांस की टोकरी, दउरा, कलसूप तथा पूजा में लगने वाले बांस के अन्य सामान बनाने में जुटे हुए हैं. भले ही इन गरीबों को बमुश्किल एक वक्त का भरपेट खाना नसीब हो पाता है पर छठ व्रतियों को सुंदर व आकर्षण बांस का कलसूप व दउरा मिल जाये, इसके लिए इनके भूख में भी इत्मीनान नजर आता है.

संघर्षपूर्ण है जीवन : उत्तर प्रदेश के मऊ, बलिया, गाजीपुर, फेफना, औड़िहार जैसे जगहों से ये कारीगर हर साल अगस्त महीने के अनंत चतुर्दशी के दिन से ही छपरा आ जाते हैं और सड़क के किनारे किसी खाली जगह पर अपना आशियाना बना लेते हैं. कार्तिक पूर्णिमा तक ये लोग सड़क किनारे ही बांस से बने सामान को बनाने का काम करते हैं. बांस का सामान बनाने वाले शंकर प्रसाद बताते हैं कि इन सामान को शहर के दुकानदारों को बेंच देते हैं और कुछ लोग सीधे ही हमारे पास खरीदने चले आते हैं. इससे होने वाली कमाई से बड़ी मुश्किल से रोजी-रोटी का जुगाड़ हो पाता है.
प्रतिदिन 16 घंटे करते हैं काम : संघर्ष में रहकर जीवन गुजार देने वाले यह कारीगर पहले बांस खरीदते हैं फिर उसे ढाका, कलसूप या अन्य चीजे बनाने में लग जाते हैं. प्रतिदिन लगभग 16 घंटे ये लोग लगातार बांस के सामान बनाने में लगे रहते हैं. काफी मेहनत के बाद सुंदर और आकर्षक बांस के सामान तैयार कर इसे थोक विक्रेताओं को बेच देते हैं या स्वयं भी दुकान छान कर इस सामान को बेचते हैं.
सही मायनो में छठ के महापर्व को और भी महान बनाने में इस लोगों का कठिन संघर्ष भी समाहित है. पूजा में लगने वाले बांस के सामान को हम आसानी से बाजार से खरीद लाते हैं पर इसके निर्माण के पीछे की कहानी वाकई हमें बहुत कुछ सीखा जाती है.
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