सन् 1885 से दिघवारा में जीवंत है नाट्य परंपरा

Updated at : 11 Sep 2017 9:17 AM (IST)
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सन् 1885 से दिघवारा में जीवंत है नाट्य परंपरा

दिघवारा : रंगमंच से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार होता है.कलाकार अपने अभिनय से समाज में मौजूद बुराईयों को दिखा कर आम जनमानस के अंदर सामाजिक चेतना पैदा करते हैं.आज भी आधुनिकता के बीच डीजे, ऑर्केस्ट्रा व जागरण के बीच दिघवारा में नाट्य परंपरा जीवंत है. 132 वर्ष पूर्व शुरू हुआ नाटक का इतिहास आज भी […]

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दिघवारा : रंगमंच से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार होता है.कलाकार अपने अभिनय से समाज में मौजूद बुराईयों को दिखा कर आम जनमानस के अंदर सामाजिक चेतना पैदा करते हैं.आज भी आधुनिकता के बीच डीजे, ऑर्केस्ट्रा व जागरण के बीच दिघवारा में नाट्य परंपरा जीवंत है.
132 वर्ष पूर्व शुरू हुआ नाटक का इतिहास आज भी अतीत बनने की बजाय आम लोगों को जागरूक कर रहा है. शायद यहीं वजह है कि आज भी यहां नाटकों की कद्र है और इसके कद्रदान भी हर साल बढ़ते ही जा रहे हैं. आर्यमंडल क्लब, दिघवारा पर हर साल दशहरा के वक्त नाटक का आयोजन होता है और इसे देखने के लिए दूर-दूर से दर्शक आते हैं. दर्शक भी काफी उत्सुकता से दशहरा के आने का इंतजार करते हैं.
दिघवारा में 1885 से शुरू हुआ रंगमंच का इतिहास : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के वर्ष यानि 1885 में दिघवारा में रंगमंच की स्थापना हुई. ब्रिटिशकालीन समय में स्थापित डाईमेटिक क्लब ऐतिहासिक व धार्मिक नाटकों को प्रस्तुत करने के लिए प्रसिद्ध हुआ करता था, फिर आर्यमंडल क्लब व कला निकेतन की स्थापना हुई, जिसके कलाकारों ने नाटकों के माध्यम से लोगों के बीच क्रांतिकारी विचारों को परोसकर हर किसी के अंदर राष्ट्र प्रेम की भावना को बढ़ाया था.
ऐसे तो रंगमंच से जुड़े दिघवारा के दर्जनों कलाकारों ने अभिनय क्षमता के सहारे देश भर में प्रसिद्धि पायी, मगर मियां हाशिम के हास्य अभिनय का कोई जोड़ नहीं था. ‘बिहार चैंपियन’ का खिताब पाने वाले मियां हाशिम जब अपनी एक्टिंग शुरू करते थे, तो दर्शक हंसते-हंसते लोट पोट हो जाते थे. आजादी के बाद तो कई दशकों तक दिघवारा में नाटक अपने चरम पर रहा और आज भी इसका क्रेज बना हुआ है. बुजुर्ग बताते हैं कि व्यापारिक केंद्र होने के चलते यहां के गोला मालिकों की अच्छी आमदनी होती थी एवं वे लोग ही नाटकों का खर्च उठाते थे. यहां के कलाकार आर्डर पर देश के विभिन्न जगहों के अलावा नेपाल तक जाकर अपनी प्रतिभा का डंका बजाते थे.
लोग रात भर उठाते थे नाटकों का आनंद : डाईमेटिक क्लब के गंगा की लहरों में समाहित होने के बाद विंध्यवासिनी देवी के पति सहदेश्वर वर्मा, द्वारिका बाबू व डॉ विद्याभूषण जैसे लोगों ने सन् 1923 में आर्यमंडल क्लब की नींव डाली. कहा जाता है कि दशहरे में कई जिलों से गंगा स्नान को पहुंचे श्रद्धालु दिघवारा में रात भर रुक कर नाटक का आनंद लेते थे. आर्यमंडल क्लब पर नाटक की शुरुआत रघुनंदन राम के नगाड़े की गूंज के साथ हुआ करती थी.
जब कलाकारों को गिरफ्तार करने पहुंच गयी थी पुलिस : 1942 में ब्रिटिश हुकूमत के प्रति भारतीयों को जागृत करने के लिए डाईमेटिक क्लब के कलाकारों ने ‘बरबादे हिन्द’ नामक नाटक का मंचन किया गया था, जिसके तुरंत बाद ब्रिटिश अधिकारी कलाकारों को गिरफ्तार करने पहुंच गयी थी, यह बात अलग रही कि कोई भी कलाकार ब्रिटिश के हाथ नहीं चढ़ सका था.
‘भ्रष्टाचार आखिर कब तक’ का होगा मंचन
इस साल भी दशहरा में आर्यमंडल क्लब पर कार्यक्रमों की धूम रहेगी. नवमी के दिन ‘भ्रष्टाचार आखिर कब तक’ नाटक का मंचन किया जायेगा, जिसमें इस बार तीन पीढ़ियों के कलाकार एक साथ एक मंच पर अपने अभिनय का जलवा बिखेरेंगे. 80 वर्षीय सरकार शरण, रंगकर्मी महेश स्वर्णकार, वार्ड आयुक्त अशोक कुमार सुमन, मनोज उज्जैन, अक्षित उज्जैन, आकांक्षा उज्जैन, रामबाबू ठाकुर, कृष्णा पासवान, त्रिपुरारी प्रसाद, अखलाक, विशाल, अजीत भगत व रंजीत जैसे कलाकार अपने फन का जलवा दिखाते हुए आम लोगों को जागरूक करेंगे.
इसके अलावा भाव नृत्य व लघु नाटकों के सहारे दर्शकों को भक्ति रस में सराबोर भी किया जायेगा.
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