विलुप्ति होने के कगार पर पहुंची ऐतिहासिक धर्ममूला नदी, संरक्षण नहीं हुआ तो मिट सकती है सदियों पुरानी विरासत

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सहरसा - संवाद में भाग लेते गण्यमान्य

Saharsa News: कभी कोसी के प्रवाह का प्रमुख मार्ग रही धर्ममूला नदी आज गाद, अतिक्रमण और प्रदूषण की मार झेल रही है. नदी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो मिथिला की यह ऐतिहासिक और पवित्र नदी आने वाले समय में पूरी तरह विलुप्त हो सकती है.

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सहरसा से विनय कुमार मिश्र की रिपोर्ट

Saharsa News: जिले के बलुवाहा में रविवार को “संकटग्रस्त धर्ममूला का सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिप्रेक्ष्य” विषय पर नदी संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम में नदी मित्र ओम प्रकाश भारती ने कहा कि वर्तमान धेमुरा नदी ही प्राचीन धर्ममूला नदी है, जो ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रही है. उन्होंने कहा कि यह नदी आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है और इसके संरक्षण के लिए समाज व सरकार दोनों को मिलकर पहल करनी होगी.

नेपाल से निकलकर कोसी में मिलती है धर्ममूला

ओम प्रकाश भारती ने बताया कि धर्ममूला नदी का उद्गम नेपाल के तराई क्षेत्र से होता है. यह सुपौल जिले से बिहार में प्रवेश करती है और चैनसिंह पट्टी के समीप दो धाराओं में विभाजित हो जाती है. इसकी पूर्वी शाखा धेमुरा तथा पश्चिमी शाखा मनुआ या पुरैन धार के नाम से जानी जाती है. दोनों धाराएं आगे चलकर सहरसा जिले के पश्चिमी भाग से गुजरते हुए सलखुआ के पास कोसी नदी में मिल जाती हैं.

उन्होंने कहा कि अतीत में कोसी नदी का प्रवाह भी धेमुरा नदी के रास्ते ही हुआ करता था, जिससे इस नदी का ऐतिहासिक महत्व और बढ़ जाता है.

धर्ममूला के किनारे बसती रही मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर

नदी मित्र ने बताया कि प्रसिद्ध कंदाहा सूर्य मंदिर, मंडन मिश्र का गांव महिषी, संत कारू खिरहर और देवन ऋषि की परंपरा इस नदी से जुड़ी हुई है. इसके अलावा कंदाहा सूर्य मंदिर, कपलेश्वर स्थान, उग्रतारा शक्तिपीठ, नाकुचेश्वर शिव मंदिर और बाबा मटेश्वर धाम जैसे कई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल भी इसी नदी के तट पर स्थित हैं.

उन्होंने कहा कि धर्ममूला के किनारे आज भी कई प्राचीन पुरातात्विक स्थलों के अवशेष मौजूद हैं, जिनमें कर्णपुर, कोपागढ़ टीला, मंडनधाम टीला और पालकालीन टीला प्रमुख हैं.

गाद, अतिक्रमण और प्रदूषण से बढ़ा संकट

ओम प्रकाश भारती ने कहा कि कृषि और मखाना उत्पादन के लिए कभी बेहद उपयोगी रही यह नदी आज गाद जमाव, अतिक्रमण और प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रही है. नदी में बढ़ते भाकन ने इसके प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित किया है. वहीं सुपौल और नवहट्टा नगर क्षेत्रों से बिना शोधन के छोड़े जा रहे नालों के पानी से प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है.

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते संरक्षण और पुनरुद्धार का कार्य शुरू नहीं किया गया तो यह ऐतिहासिक और पवित्र नदी विलुप्त हो सकती है.

Saharsa News: संरक्षण के लिए सामूहिक पहल जरूरी

नदी संवाद में वक्ताओं ने कहा कि धर्ममूला नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक पहचान है. इसके संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए सरकारी प्रयासों के साथ स्थानीय समाज की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है.

कार्यक्रम में भूतपूर्व मुखिया नरेश यादव, नदी कार्यकर्ता दीपक कुमार, डॉ महेंद्र, अविनाश आर्या, विवेक झा, राकेश मिश्र सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे.

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Pratyush Prashant

लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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