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पर्यावरण के असंतुलन व मनुष्य के बीमार होने का मूल कारण है मानसिक प्रदूषण

Updated at : 13 Jul 2025 5:24 PM (IST)
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पर्यावरण के असंतुलन व मनुष्य के बीमार होने का मूल कारण है मानसिक प्रदूषण

पर्यावरण के असंतुलन व मनुष्य के बीमार होने का मूल कारण है मानसिक प्रदूषण

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प्रतिभा को ईश्वरीय अनुदान व पुरुषार्थ से किया जा सकता है विकसितः डॉ अरूण सहरसा . गायत्री शक्तिपीठ में रविवार को भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का प्रमाण पत्र व पुरस्कार कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन कर किया गया. दीप प्रज्वलन प्राचार्य दिल्ली डॉ लीना सिन्हा, प्राचार्य सेंट्रल स्कूल डॉ मोनिका पांडेय, मधुबनी एडिशनल न्यायाधीश पाठक आलोक कौशिक, लखनऊ से दीपक मिश्रा व रुचि ने किया. इस मौके पर सभी अतिथियों, प्राचार्य व शिक्षक को सम्मानित किया गया. भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा में जिला स्तर एवं प्रखंड स्तर पर प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान आने वाले छात्रों को प्रमाण पत्र मेडल एवं मोमेंटो देकर पुरस्कृत किया गया. इस मौके पर सत्र को संबोधित करते डॉ अरूण कुमार जायसवाल ने कहा कि जीवन का जो चक्र है, वह भी स्वच्छता के तहत आता है. स्वच्छता का शरीर से भी मतलब है एवं मन से भी मतलब है. शरीर स्वच्छ नहीं है तो हम बीमार पड़ेंगे व मन स्वच्छ नहीं है तो हम मानसिक रूप से इरिटेटेड व उद्विग्न रहेंगे. जिस स्थान पर स्वच्छता और सुव्यवस्था रहती है वहां पर जाते ही मन प्रसन्न हो जाता है, खुशी महसूस होने लगती है. जो आदमी स्वच्छता के दायित्व को निभाता है, स्वच्छ वातावरण में रहता है, उस आदमी का इम्युनिटी बूस्ट हो जाता है. उन्होंने कहा कि पर्यावरण के असंतुलन का व मनुष्य के बीमार होने का मूल कारण है मानसिक प्रदूषण. अंदर की गंदगी हटेगी तो बाहर की गंदगी भी हटेगी. तब स्वच्छता सही मायने में घटित होगी. सच यह है कि हम अप्राकृतिक जीवन जीते हैं. ना सोने का समय, ना खाने का समय, ना जागने का समय, ना हमारे खाने में कोई हाइजिन है, ना रहन सहन में कोई हाइजिन है तो हमारे अंदर भी असंतुलन पैदा होगा. उन्होंने कहा कि प्रतिभा ईश्वरीय विभूति है, ईश्वरीय वरदान है. यह सहज रूप में प्राप्त नहीं होता है. प्रतिभा को ईश्वरीय अनुदान व पुरुषार्थ से विकसित किया जा सकता है. किसी में जन्मजात प्रतिभा होती है एवं किसी को अपनी प्रतिभा विकसित करनी पड़ती है. प्रतिभा हमें मनुष्य जीवन के शिखर तक पहुंचा देती है. प्रतिभा हमारे व्यक्तित्व का एक हिस्सा है, समूचा व्यक्तित्व नहीं. प्रतिभा वो होती है जो व्यक्तित्व को परिवर्तित करती है. इस अवसर पर न्यायाधीश पाठक आलोक कौशिक ने न्याय व कर्म सिद्धांत के बारे में छात्र छात्राओं को संबोधित किया. मोनिका पांडे से ज्ञान का महत्व बताया.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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Dipankar Shriwastaw

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