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पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचने की जगह शिलापट्ट में सिमट कर रह गयी स्वतंत्रता सेनानी की गाथा

Updated at : 14 Aug 2025 6:00 PM (IST)
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पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचने की जगह शिलापट्ट में सिमट कर रह गयी स्वतंत्रता सेनानी की गाथा

पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचने की जगह शिलापट्ट में सिमट कर रह गयी स्वतंत्रता सेनानी की गाथा

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पचाढ़ी गांव निवासी स्वतंत्रता सेनानी जंगली प्रसाद सिंह ने कई आंदोलनों में निभायी थी अग्रणी भूमिका कांग्रेस ने विधायक के टिकट की दी थी पेशकश, कर दिया था इंकार अमित राठौड़, सोनवर्षाराज आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी जान की परवाह किये बगैर अपना सर्वस्व देने वाले कोपा पंचायत के पचाढ़ी गांव निवासी स्वतंत्रता सेनानी जंगली प्रसाद सिंह ने कई आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभायी. गांधीजी के साथ कई आंदोलन में भाग लेने वाले व गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित इस योद्धा का आजादी के 40 साल बाद वर्ष 1987 में निधन हो गया था. जिसके बाद गुमनाम इस स्वतंत्रता सेनानी की गाथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचने की जगह प्रखंड मुख्यालय स्थित झंडोत्तोलन स्थल पर लगे एक शिलापट्ट में सिमट कर रह गयी है. जिस पर शायद ही अब किसी की नजर पड़ती है. शिलापट्ट के रंगरोगन से उकेरा गया नाम अब सफेद रंगों में छुप गया है. जिसे गहरे रंग से उकेरने की जरूरत है. साथी की शहादत ने बदल दी जिंदगी की दिशा स्वतंत्रता सेनानी जंगली प्रसाद सिंह के पौत्र व पूर्व मुखिया ललन प्रसाद सिंह बताते हैं कि भागलपुर में आंदोलन के दौरान वंदे मातरम् का नारा लगाने पर उनके एक साथी को अंग्रेजी पुलिस ने गोली मार दी. यह घटना जंगली प्रसाद सिंह के मन में आग बनकर धधक उठी. बदला लेने के लिए उन्होंने हथियार उठाकर अकेले पुलिस कैंप पर धावा बोलने की ठानी. लेकिन गांधी जी के अहिंसावादी संदेश व गांधी विचारधारा ने उनका मन बदल दिया. इसके बाद वे पूरी निष्ठा से स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े और अंग्रेजों के खिलाफ जनांदोलन का नेतृत्व करने लगे. आंदोलन के नेतृत्व ने उन्हें अंग्रेजी हुकूमत की आंख की किरकिरी बना दी. अंग्रेजी पुलिस उन्हें पकड़ने के लिए उनके घर पर बार-बार छापेमारी शुरू कर दी. जान बचाने के लिए वे महीनों तक जमुई जिले के गेगटामोड़ जंगल में छिपकर रहे. भूख लगने पर वे पेड़ों की पत्तियां खाकर दिन काटते थे. लेकिन हौसला कभी डगमगाया नहीं. विधायक का टिकट लेने से कर दिया था इंकार स्वतंत्रता के बाद झंडोत्तोलन अवसर पर वे साथियों की कुर्बानी याद कर जंगली प्रसाद सिंह भावुक हो जाते थे. आंखों से आंसू की अविरल धारा बहने लगती थी. 1952 में कांग्रेस ने उन्हें विधायक का टिकट देने की पेशकश की. मगर सत्ता का मोह त्यागते हुए उन्होंने टिकट लेने से साफ मना कर दिया. उनके पौत्र ललन प्रसाद सिंह ने प्रशासन से शिलापट्ट को संवारने और रणबांकुरे की गाथा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने की मांग की है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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Dipankar Shriwastaw is a contributor at Prabhat Khabar.

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