मकर संक्रांति पर उमड़ी मंदिरों में भीड़
त्रिदोष दूर करता है तिल व गुड़, दान देने की भी रही है परंपरा
सहरसा. बिहार के मिथिलांचल एवं कोसी के बड़े भाग में मकर संक्रांति पर पूजा अर्चना की विशेषता व विविधता रही है. यहां मान्यता है कि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने से संक्रमण का यह विशेष काल स्नान, दान एवं खान-पान से परिशुद्ध किया जाता है. इससे बल, वैभव एवं सनातन का आध्यात्मिक शौर्य प्राप्त किया जा सकता है. चावल, उड़द की दाल से तैयार खिचड़ी में तिल सहित सब्जियों की रेसिपी मिलाकर तैयार भोजन बहुत स्वादिष्ट व विशेष होता है, लेकिन इस बार इस तिथि को एकादशी रहने से लगभग सभी घरों में खिचड़ी नहीं बनी. इसकी जगह चूड़ा-दही की ही प्रधानता रही. कई स्थानों में चूड़ा दही की प्रधानता मुख्य भोजन के रूप में रहती है. इस दिन स्नान की प्रधानता होती है, जिसमें सिर पर तिल रखकर स्नान नदी या तालाब में लोग करते हैं.
मकर संक्रांति के पावन मौके पर बड़े बुजुर्गों से गुड़, तिल, अक्षत एवं केला मिलाकर प्रसाद लेने की भी परंपरा है. जिसमें बुजुर्ग माता-पिता को उनके बच्चे, सगे संबंधी यह आश्वासन देते हैं कि वह धर्म को साक्षी मानते कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे. इसमें मैथिली भाषाई क्षेत्र में पूजन के बाद हथेली पर तिल का प्रसाद रखकर बड़े बुजुर्ग पूछते हैं कि तिल बहवै कि नै एवं सामने खड़ा व्यक्ति स्वीकार्यता देता है. मकर संक्रांति में ब्याहता बेटियों के घर नया चावल, उड़द का दाल एवं तिल से तैयार तिलकुट, लड्डू व दही भेजने की भी परंपरा है. निम्न आय वर्ग के लोग भी अपने बेटियों के ससुराल में लाई, तिलकुट एवं तिल के बने अन्य मिष्ठान अवश्य भेजते हैं. जिसे आज भी निभाया जा रहा है. इस पर्व विशेष में जरूरतमंदों को दान देने की भी परंपरा है. दान में तिल, गर्म कपड़ा, कंबल दिया जाता है, जिसे आज भी लोग बढ़-चढ़कर निभा रहे हैं. इसे एक बड़े परिदृश्य में देखें तो आंचलिक नेताओं से बड़े नेताओं के बीच संक्रांति में स्वजन एवं कार्यकर्ताओं को चूड़ा-दही पर निमंत्रण देकर खिलाने की एक नयी परंपरा भी तैयार हुई है. राजनीतिक साठ-गांठ की खिचड़ी भी यहां पकाई जाती है.त्रिदोष को संतुलित करता है मकर संक्रांति का सभी अन्न
मकर संक्रांति पर्व की यह विशेषता है कि इसमें जितने भी तरह के अनाज व्यवहार में ले जाते हैं. वह सभी त्रिदोष अर्थात कफ, पित्त, वायु को संतुलित करते हैं एवं शरीर को पुष्ट भी करते हैं. तिल का प्रयोग सभी मांगलिक कार्यों में होता है. वहीं इसे सिर पर रखकर स्नान भी इस पावन तिथि में किया जाता है. यह कफ को घटाने की एक रामबाण औषधि भी है. तिल से तैयार गजक, तिलकुट या तिलवा एक स्वादिष्ट मिष्ठान भी है. इस मौके पर खिचड़ी में भी तिल मिलाकर भोजन तैयार किया जाता है. साथ ही इसके लड्डू सबसे ज्यादा पौष्टिक होते हैं. खिचड़ी में मिलाई जाने वाली उड़द की दाल जीवन तत्वों से भरपूर है, जो शरीर में पित्त कारक एवं बात कारक तत्वों को संतुलित करती है. स्थानीय आयुर्वेदाचार्य डॉ अजय कुमार कहते हैं कि इसमें एल्बुमिनाइट, स्टार्च, फाइबर एवं अन्य क्षार होते हैं जो शरीर के लिए आवश्यक है. यह आंतों की सफाई भी करता है. जाड़े में जो म्यूकस आंतों में जमा होता है, उसकी भी शुद्धि करता है. गुड़ का उपयोग अद्भुत है. यह पेट के कृमि को निकाल बाहर करता है. इसके वैज्ञानिक आधार भी हैं. साथ ही यह रक्त के अंदर हीमोग्लोबिन की मात्रा भी बढ़ता है. जिसमें आयरन, मैग्नीशियम, पोटेशियम जैसे महत्वपूर्ण तत्व मौजूद रहते हैं. साथ ही इसे एंटी एलर्जी भी माना जाता है.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

