यहां कोई आता-जाता भी नहीं

विज्ञान केंद्र. वर्ष 2007 में तत्कालीन मंत्री ने किया था उद्घाटन नौ फरवरी 2007 को सुपर बाजार में जिला विज्ञान केंद्र का उद्घाटन हुआ था, लेकिन यहां के स्कूलों की आेर से बच्चों को कभी यहां आकर जानकारी देने की कोशिश नहीं की गयी. न ही स्वतंत्र रूप से अभिभावक ही बच्चों को लेकर यहां […]
विज्ञान केंद्र. वर्ष 2007 में तत्कालीन मंत्री ने किया था उद्घाटन
नौ फरवरी 2007 को सुपर बाजार में जिला विज्ञान केंद्र का उद्घाटन हुआ था, लेकिन यहां के स्कूलों की आेर से बच्चों को कभी यहां आकर जानकारी देने की कोशिश नहीं की गयी. न ही स्वतंत्र रूप से अभिभावक ही बच्चों को लेकर यहां पहुंचे. यहां सुविधाअों की कमी भी इसका एक कारण हो सकता है.
सहरसा : नौ फरवरी 2007 को शहर के सुपर बाजार में जिला विज्ञान केंद्र का उद्घाटन तत्कालीन विज्ञान प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ अनिल कुमार व विधायक संजीव कुमार झा द्वारा किया गया था. लाखों की लागत से बने विज्ञान केंद्र को बनाने के बाद जिले में रह रहे छात्र-छात्रा व विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों की आवाजाही की उम्मीद की गयी थी. उद्घाटन के शुरुआती दौर में स्थानीय कुछ विद्यालय के प्रबंधन द्वारा बच्चों को केंद्र में लाकर विज्ञान के प्रायोगिक पक्ष से अवगत भी कराया गया था. लेकिन जिले की विडंबना कहिए कि विज्ञान केंद्र दस साल बाद आगे बढ़ने के बजाय पिछड़ता ही चला गया. केंद्र से मिली जानकारी चौंकाने वाली है. विगत सात वर्षों में एक भी व्यक्ति अपनी वैज्ञानिक जिज्ञासा को शांत करने विज्ञान केंद्र में नहीं पहुंचे हैं.
जमींदोज हो रहे विज्ञान केंद्र को बचाने की फिक्र न तो सरकारी महकमा ही कर रहा है और न ही विज्ञान में अभिरुचि रखने वाले लोग ही आगे आ रहे हैं. हालांकि प्रत्येक वर्ष परिभ्रमण के नाम पर सरकारी स्कूलों में जरुर करोड़ों रुपये फूंके जा रहे हैं. विज्ञान केंद्र राजकीय पोलिटेक्निक के अधीन कार्य करता है. जहां प्रभारी मिथिलेश कुमार सिंह के अलावा एक चतुर्थवर्गीय कर्मी रामदेव कामत तैनात हैं.
बच्चों में प्रायोगिक ज्ञान भी जरूरी: उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों को सैद्धांतिक व प्रायोगिक दोनों प्रकार की जानकारी देने की व्यवस्था होती है. जबकि प्राथमिक व मध्य विद्यालय के बच्चे को इस प्रकार की सुविधा नहीं मिल पाती है. ऐसे में विज्ञान केंद्र, पुस्तकालय सरीखे संस्थानों के भ्रमण से नौनिहालों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सकता है. बच्चों को उग्रतारा स्थान, सिंहेश्वर व बौद्ध मंदिर नरपतगंज घुमाने का क्या फायदा, जब उन्हें जिले के डीएम व एसपी के नाम भी नहीं मालूम होते हैं.
बिजली, पानी व शौचालय नहीं: प्रशासनिक उदासीनता की वजह से जिला विज्ञान केंद्र में उद्घाटन के दशक बीत जाने के बावजूद बिजली, पानी व शौचालय की व्यवस्था नहीं की गयी है. इसके अलावा उत्तर दिशा से मुख्य दरवाजा भी जर्जर हो गया है. निर्माण के बाद दीवार पर सफेदी कर रंग भी दुबारा नहीं चढ़ा है. इन सभी कुव्यवस्थाओं को दुरुस्त कर भविष्य निर्माण के प्रति एक सकारात्मक पहल की कोशिश की जा सकती है.
मंदिर भ्रमण, तो विज्ञान केंद्र क्यों नहीं
सरकारी स्कूलों में परिभ्रमण के नाम पर मंदिर व धार्मिक स्थल भ्रमण कराने के बजाय जिला विज्ञान केंद्र, प्रमंडलीय पुस्तकालय, शहीद स्मारक, समाहरणालय सहित मुख्यालय स्थित उच्च शिक्षण संस्थानों में भी बच्चों को लाया जा सकता है. ताकि स्कूली जीवन जी रहे बच्चे इन जगहों पर पहुंच भविष्य निर्माण के प्रति जागरूक हो सके. बच्चों के परिभ्रमण से उक्त जगहों की प्रासंगिकता भी बरकरार रहेगी. इसको लेकर जिला प्रशासन के स्तर से भी विद्यालयों को निर्देशित किया जा सकता है. ज्ञात हो कि परिभ्रमण के नाम पर बच्चों को नेपाल बराज सहित दूर दराज के मंदिरों में ले जाने की वजह से अभिभावक भी परेशान होते हैं. इस प्रकार की नयी व्यवस्था होने से सरकारी राशि के अनावश्यक खर्च को भी कम किया जा सकता है.
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