ब्रज से अलबेली है सहरसा के बनगांव की होली
Updated at : 19 Mar 2019 7:11 AM (IST)
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सहरसा : कौन हिंदू, कौन मुस्लिम, हजारों की भीड़ में एक-दूसरे के कंधे पर सवार होकर रंग का जश्न मनाते लोगों की टोली को देखना है तो बुधवार को जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बनगांव आना होगा. बनगांव की होली ब्रज की होली की तरह मनायी जाती है. बूढे, जवान या […]
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सहरसा : कौन हिंदू, कौन मुस्लिम, हजारों की भीड़ में एक-दूसरे के कंधे पर सवार होकर रंग का जश्न मनाते लोगों की टोली को देखना है तो बुधवार को जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बनगांव आना होगा.
बनगांव की होली ब्रज की होली की तरह मनायी जाती है. बूढे, जवान या बच्चे में कोई भेद नहीं रहता है ओर न रंग का न वर्ण का और न ही उम्र का. रंगीन पानी के फव्वारे के नीचे एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में सभी व्यस्त रहते है. लेकिन इस पछाड़ में भी प्यार रहता है.
अलग-अलग चौक चौराहों पर लोगों की टोली जमा होती है और कारवां बढ़ता जाता है. जो शाम होने से पहले देवी स्थान पर जमा होकर रात तक रंग व होली की मस्ती में सब सराबोर होते रहते हैं. बनगांव का भगवती स्थान हो या ललित झा बंगला, सभी जगहों का जीवंत दृश्य पूरे सूबे में मनायी जाने वाली होली और बनगांव के फगुआ को विशिष्ट बनाती है.
बनगांव में धार्मिक रूप से होली मनाई जाती है. जिसमें संत लक्ष्मीनाथ कुटी, विषहरी स्थान, भगवती स्थान, ठाकुड़बारी में लोगों के हुजूम का पहुंचना काफी महत्वपूर्ण है. भगवती स्थान में जमा होकर बनने वाली मानव शृंखला का अद्भुत नजारा एवं उसमें शामिल लोगों का उत्साह ब्रज की होली की तरह ही बनगांव की होली को स्थापित करता है.
भगवती स्थान में जुटने से पहले गावं के पछवारी टोला एवं दक्षिणवारी टोला का मिलन राजा मनसाराम खां के दरवाजे से विषहरी स्थान के बीच होता है. उसी तरह पुवारी टोला एवं रामपुर बंगला के बीच भी लोगों का मिलन होता है.
लोक देवता संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने किया था प्रारूप में बदलाव: ढोल, मृदंग की धुन पर उमंगों में सराबोर शाम होते ही बनगांव के विभिन्न टोले में युवाओं की टोली होली गीत गाकर माहौल को भक्ति के रंग में रंगने का काम कर रहे हैं.
हालांकि गांव में प्रवेश करने के साथ ही आपका वास्ता गगनचुंबी इमारतों से पड़ेगा, लेकिन होली गीत के बार-बार दोहराये जाने वाले शब्द लक्ष्मीपति हो तो समझिए कि आप निश्चित रूप से सहरसा जिला मुख्यालय से आठ किमी पश्चिम बनगांव पहुंच गये हैं. जहां की आबादी वैज्ञानिक युग के अनुसार विकास के पथ पर प्रगति कर रही है तो थिलांचल की सभ्यता व संस्कृति आज भी रहने वाले सभी लोगों के सीने में कुलांचे भर रही हैं.
चाहे फिर घर की चहारदिवारी में ठिठोली करती महिलाओं की मस्ती, होली के रंग व उल्लास में रम रहे युवा हो सभी ब्रज की होली की तरह पारंपरिक रूप से मनायी जाने वाली बनगांव की होली की परंपरा कायम रखे हुए है.
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