खाली पड़े हैं सरकारी शिविर, राहत के नाम पर लूट

Published at :26 Aug 2017 6:15 AM (IST)
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खाली पड़े हैं सरकारी शिविर, राहत के नाम पर लूट

समस्या. दोपहर तीन बजे तक भोजन करने नहीं पहुंचे विस्थापित, मौके पर एक भी अधिकारी नहीं थे मौजूद पानी कम होने के बाद 20 से 21 तारीख तक सरकारी शिविर से विस्थापितों की संख्या नगण्य हो गयी है. सौरबाजार (सहरसा) : सौरबाजार प्रखंड के सिलेठ व कढ़ैया गांव के बाहरी इलाके में बाढ़ का पानी […]

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समस्या. दोपहर तीन बजे तक भोजन करने नहीं पहुंचे विस्थापित, मौके पर एक भी अधिकारी नहीं थे मौजूद

पानी कम होने के बाद 20 से 21 तारीख तक सरकारी शिविर से विस्थापितों की संख्या नगण्य हो गयी है.
सौरबाजार (सहरसा) : सौरबाजार प्रखंड के सिलेठ व कढ़ैया गांव के बाहरी इलाके में बाढ़ का पानी आने की वजह से बीते 17 अगस्त की शाम से सरकार के निर्देशानुसार भगवती स्थान सिलेठ व कढ़ैया के सरकारी विद्यालय में राहत शिविर की शुरुआत अंचल प्रशासन ने जिला प्रशासन के निर्देश पर की थी.
सरकारी राहत शिविर शुरू होने के बाद लगातार तीन दिनों तक चार सौ से पांच सौ की संख्या में गांव के लोग दोनों वक्त भोजन करने पहुंचते थे.जिसमें आसपास के पांच वार्डों के प्रभावित लोगों के अलावा गांव के लोग भी शामिल थे. लेकिन पानी कम होने के बाद बीस से इक्कीस तारीख तक सरकारी शिविर से विस्थापितों की संख्या नगण्य हो गयी. गांव के लोग बताते हैं कि स्थिति सामान्य हो गयी.
पर्व त्योहार का समय है, सभी ईश्वर की आराधना में व्यस्त है. हालांकि दिन के समय दो से तीन दर्जन महिला-पुरुष व बच्चे जरुर पहुंचते हैं. जबकि सरकारी आंकड़े या तैनात नुमाइंदों की बात करें तो शुरुआती समय में दो हजार से अधिक लोगों का भोजन दिन-रात तैयार किये जाते थे. लेकिन अब भी बारह सौ से चौदह सौ लोगों के भोजन तैयार करने का दावा किया जा रहा है. जबकि जमीनी हकीकत दूसरे क्रियाकलाप की तरफ इशारा कर रही है.
क्या कहते हैं सीओ
सीओ रमेश कुमार ने बताया कि दोनों शिविर में 17 अगस्त की शाम से रोजाना औसतन 12 सौ लोग दोनों टाइम भोजन कर रहे हैं. शुरुआती समय में 22 सौ आदमी का भोजन तैयार हो रहा था. शिविर में विस्थापितों की संख्या नदारद रहने के बाबत उन्होंने बताया कि लोग आते हैं, खाना खाकर चले जाते हैं.
स्थिति सामान्य कागज में आपदा : अब जरा स्कूलों का हाल भी जान लिजिए, बाढ़ पीड़ित इलाकों में लगभग सारे स्कूल बंद हैं. लाखों बच्चों का भविष्य दांव पर है. इन स्कूलों में पहले से पढ़ रहे बच्चे घर पर वक्त बिता रहे हैं. पता नहीं वो कब स्कूल जायेंगे. सरकार ने वैसे तो स्कूलों को खाली करा कर बाढ़ पीड़ित लोगों के लिए शिविर बना दिये हैं. अभी तक सारे फैसले कागज पर ही हैं. यहां स्थानीय प्रशासन द्वारा नियुक्त एक भी अधिकारी नहीं नजर आये. जबकि यहां चिकित्सक समेत करीब पांच अन्य सरकारी कर्मियों की ड्यूटी लगाया गयी थी.
उम विद्यालय कढ़ैया की हालत बदतर
कढ़ैया स्थित उच्च मध्य विद्यालय की हालत और भी बदतर थी. इस विद्यालय में भी सरकारी व्यवस्था से राहत शिविर संचालन किये जाने के दावे किये जा रहे हैं. विद्यालय के परिसर में पांच छह महिलाएं व एक व्यक्ति मिले. जिन्होंने बताया कि बीते दो दिनों से चावल नहीं रहने की वजह से शिविर नहीं चलाया जा रहा है. विस्थापितों के बारे में पूछने पर बताया कि सभी अपने घरों में है. खाना खाने के लिए चले आते है. जबकि गांव के लोगों ने बताया कि दो दिन ही शिविर में लोगों की भीड़ थी. तीन दिन पहले सौ लोगों को चुरा का भूजा खाने को दिया गया था. जबकि रसोईये ने बताया कि प्रत्येक दिन चार बोरा चावल, दो टिना सरसों तेल, दो बोरा आलू, एक बोरा प्याज, एक बोरा सोयाबीन की खपत होती है. जबकि राहत शिविर के स्टोर में सिर्फ एक खाली चावल का बोरा व पांच-पांच किलों के दो सरसो तेल का गैलन ही देखने को मिला. रसोईया रीना देवी ने बताया कि रोजाना 14 सौ लोगों का भोजन तैयार होता है. दोनों वक्त लोगों की भीड़ लगी रहती है. दूसरी महिला रसोईया ने बताया कि एक टाइम ही शाम के चार बजे खाना बनाया जाता है. ग्रामीण शिवेश महतो ने बताया कि 20 अगस्त से जनजीवन सामान्य हो गया है. लोग अपने घरों में ही रह रहे हैं. शिविर में फर्जी बिल बना कर लूट की जा रही है.
10-20 महिला व पुरुष के अलावा दर्जन भर थे बच्चे
शुक्रवार को दिन के दस बजे भगवती स्थान सिलेठ के परिसर में दस से बीस महिला व पुरुष के अलावा दर्जन भर बच्चे बैठे थे. इनलोगों ने बताया कि मंदिर के पीछे ही उनका घर है. सुबह की ताजी हवा का सेवन करने रोजाना पहुंच जाते हैं. जबकि मंदिर परिसर में एक टेंट के नीचे दो चूल्हे पर भोजन बनाने की तैयारी भी हो रही है. पांच लोग काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि सभी लोग खाना खाने के लिए आये हैं, बाकि लोग 13 सौ के करीब आने वाले है. दोनों वक्त मिलाकर लगभग तीन हजार लोगों का खाना रोजाना बनाते हैं. जबकि पांच किलो प्याज, दस किलो आलू व सोयाबीन की सब्जी के साथ एक नादी में चावल बनाये जाने की व्यवस्था थी. दो-तीन बरतन खाली भी रखे हुए थे. जिसमें भी खाद्य पद्धार्थ बनाया जाय तो बमुश्किल दो सौ लोग को ही ससमय भोजन दिया जा सकता है. जब हमने कम सामग्री में ज्यादा लोगों के भोजन की बातें पूछी तो बताया कि जैसे जैसे लोग आयेंगे वैसे ही भोजन तैयार करेंगे. सरकार कहती है कि विस्थापितों को गरम खाना देना है. खाना परोसने के समय के बाबत उन्होंने बताया कि रोजाना 12 बजे दोपहर में भोजन के लिए लंबी लाइन लग जाती है. सच्चाई यह थी कि दोपहर के तीन बजे तक तैयार पचास से सत्तर लोगों के भोजन को बार-बार गरम कर चूल्हे से उतारा जा रहा था. लेकिन खाने की प्लेट लिए एक भी व्यक्ति को किसी ने शिविर में आते नहीं देखा. अब शिविर के बावर्ची से भी परिचय कर लिजिए. यह हैं गांव के ही बालाजी सादा, अशोक मंडल, शंभु मंडल, कपिलदेव सादा. इनलोगों ने बताया कि गांव से लेकर परदेश तक मजदूरी करते थे. पहली बार भोजन बनाने का काम मिला है. जिला प्रशासन व सरकार की संजीदगी का अंदाजा शिविर में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से घटित वाक्ये से सहज ही लगाया जा सकता है.
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